Monday, March 20, 2017

बच्चों से चर्चा

साइकिल यात्रा के दौरान स्कूल के बच्चों के साथ मेरी बातचीत,
मैनें बच्चों से पूछा, समाज में ज़्यादा मेहनत करने वाले मज़े में है,
या कुर्सी पर बैठ कर हुकुम चलाने वाले मजे में हैं,
बच्चों ने जवाब दिया कुर्सी पर बैठ कर हुकुम चलाने वाले,
मैनें पूछा, मेहनत करने वाले तकलीफ में और कुर्सी पर बैठ कर हुकुम चलाने वाले मजे में,
क्या यह न्याय है ?
बच्चों नें जवाब दिया नहीं यह अन्याय है,
मैनें अगला सवाल किया,
हम सब गन्दगी करते हैं,
लेकिन एक खास ज़ात के लोग उसे साफ करते हैं,
गन्दगी करने वाले अच्छे होते हैं या सफाई करने वाले ?
बच्चों ने जवाब दिया सफाई करने वाले अच्छे,
मैनें पूछा ज़्यादा इज़्जत किसकी होनी चाहिये ?
गन्दगी करने वालों की या सफाई करने वालों की ?
बच्चों ने जवाब दिया सफाई करने वालों की,
मैनें पूछा क्या सफाई करने वालों को ज़्यादा इज़्जत मिलती है ?
बच्चों ने कहा नहीं मिलती,
मैनें पूछा यह न्याय है या अन्याय ?
बच्चों ने जवाब दिया अन्याय है,
मैनें पूछा जहां अन्याय हो क्या वहां शान्ति हो सकती है ?
बच्चों ने कहा नहीं हो सकती,
मैनें पूछा समाज में अन्याय बना रहे तो क्या पुलिस और फौज के दम पर शान्ति लाई जा सकती है ?
बच्चों ने जवाब दिया नहीं लाई जा सकती,
मैनें पूछा समाज में शान्ति लाने का क्या रास्ता है ?
बच्चों नें कहा अन्याय मिटाना पड़ेगा,
मैनें पूछा समाज से अन्याय कौन मिटायेगा ?
बच्चों ने कहा हम मिटायेंगे,

युवाओं से चर्चा

साईकिल यात्रा के दौरान गांव मे काम करने वाले,
युवा कार्यकर्ताओं के साथ मेरी बातचीत,
मैने पूछा, मान लो दो ज़िले हों,
एक जिले में बहुत बड़ी बड़ी फैक्टरियां हों,
और दूसरे जिले में कोई फैक्टरी नहीं हो,
तो कौन से जिले को विकसित कहा जायेगा ?
फैक्टरी वाले जिले को,
या बिना फैक्टरी वाले जिले को ?
युवाओं ने उत्तर दिया जी फैक्टरियों वाले जिले को विकसित जिला कहेंगे,
मैने आगे पूछा,
फैक्टरी का मालिक अमीर होता है या गरीब ?
अमीर आदमी, युवाओं ने एक स्वर में जवाब दिया,
मैनें पूछा, फैक्टरियों का मुनाफा किसकी जेब में जाता है ? अमीर की या गरीब की ?
अमीर की जेब में , युवाओं ने कहा,
अमीर की फैक्टरी के लिये जमीन किसकी ली जाती है, अमीर की या गरीब की ? मैनें पूछा,
गरीब की जमीन ही ली जाती है, युवाओं नें जवाब दिया,
तो विकास का अर्थ है गरीब से ले लो और अमीर को दे दो,
ठीक है ?
युवा चौंक पड़े,
बोले हां सच तो है पर हमने कभी ऐसा सोचा नहीं था,
मैनें बात आगे बढ़ाई,
उद्योगपति को गरीब की ज़मीन कैसे मिलती है ?
युवाओं ने कहा सरकार गरीबो से ज़मीन लेकर अमीरों को देती है,
मैनें पूछा क्या गरीब आराम से अपनी ज़मीन सरकार को दे देता है ?
युवाओं ने कहा नहीं पुलिस आती है किसानों को पीटती है, गोली चलाती है,
मैनें पूछा देश का मालिक कौन है ?
देश की मालिक देश की जनता है, युवाओं ने जवाब दिया,
पुलिस और सरकार का मालिक कौन है ? मैने पूछा ?
पुलिस और सरकार का मालिक भी जनता है युवाओं नें कहा,
तो मालिक का माल नौकर छीन रहा है ?
और मालिक विरोध कर रहा है तो नौकर मालिक को पीट रहा है ?
और इसे हम कहते हैं लोकतन्त्र, मैनें कहा,
देश में करोड़ों लोगों की ज़मीनों, पहाड़ों, नदियों पर इसी तरह पीट पीट कर कब्ज़ा किया जा रहा है,
अमीरों के जनता की ज़मीनें छीनने के लिये जिन सिपाहियों को लगाया जा रहा है वह भी गरीबों के बच्चे हैं,
तो गरीब ही गरीब को मार रहा है और फायदा अमीर का हो रहा है,
यही राजनीति की चालाकी है,
इसे समझना और इसका जवाब देना हमारी राजनीति होगी,
बाकी की चर्चा अगले सत्र में,

संघ और हम

आज़ादी के आन्दोलन में ही तय हो गया था कि आज़ादी के बाद भारत कैसा बनाया जायेगा ?
गांधी भगत सिंह नेहरु पटेल अम्बेडकर सब अपनी अपनी तरह से आज़ादी के बाद के भारत के लिए आदर्श तय करने में लगे हुए थे .
आज़ाद भारत के लिए सबके सपनों में मामूली से फर्क होने के बावजूद कुछ बातें एक जैसी थीं .
सभी लोग बराबरी और न्याय को आज़ाद भारत का आधार मानते हुए जाति धरम से मुक्त गाँव , गरीब मजदूरों की हालत बदलने को आज़ादी के बाद सबसे पहला काम मानते थे .
लेकिन उस वख्त भी एक कौम ऐसी थी जो आज़ादी की लड़ाई में तो शामिल नहीं थी .
लेकिन शातिर बिल्ली की तरह आज़ादी मिलने के बाद सत्ता पर कब्ज़ा करने के मंसूबे बना रही थी .
यह थी राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ ,और हिंदू महासभा .
यह उन लोगों की जमात थी जो सदियों से भारत में सत्ता के नज़दीक रहे थे , व्यापारी थे , बड़ी जात के अमीर थे , ज़मींदार थे और सत्ता के दलाल थे .
ये लोग डर रहे थे कि कहीं ऐसा ना हो कि आज़ादी के बाद बराबरी आ जाय और कुचले दबे नीच जात के गरीब गुरबे भी हमारे बराबर हो जाएँ .
इसलिए इन सत्ता के दलालों ने आज़ादी मिलते ही भारत की राजनीति को समानता की ओर से मोड़ कर साम्प्रदायिकता की तरफ करने के लिए पूरी ताकत लगा दी.
आज़ादी मिलते ही सवयम सेवक संघ ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी और बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ती रख दी .
इन लोगों ने पूरी ताकत से इस बात को प्रचारित किया कि आज़ाद भारत की राजनीती का लक्ष्य सबकी समानता नहीं बल्कि यह होना चाहिये कि राम का मंदिर बनेगा या नहीं .
तब से ये लोग भारत की राजनीति को आर्थिक और सामाजिक समानता की पटरी से उतार कर साम्प्रदायिकता की पटरी पर लाने का प्रयत्न करते रहे और अंत में सफल भी हो गए .
आप देखेंगे कि इन संघियों को समानता और न्याय का नाम सुनते ही बुखार चढ़ जाता है
और ये आपको कम्युनिस्ट और विदेशी एजेंट कहने लगते हैं .
लेकिन आज़ादी की लड़ाई का काम अभी अधूरा है .
ये लोग धोखा देकर भले ही कुछ समय के लिए सत्ता पर काबिज हो गए हैं .
लेकिन भारत में सभी नागरिकों की बराबरी और सबको न्याय का बड़ा काम अभी बाकी है .
हम हारे नहीं हैं .

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की छत्तीसगढ़ सरकार को फटकार

छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमलों को देखते हुए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ सरकार को फटकार लगाई है,
छत्तीसगढ़ में 14 साल से भाजपा की सरकार है,
इस सरकार ने लोगों के मानवाधिकार को कुचलने का विश्व रिकॉर्ड बनाया है,
सरकारी सिपाहियों के द्वारा जितनी बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाओं से बलात्कार किए गए हैं,
जितने निर्दोष लोगों की हत्या की गई,
जितने निर्दोष आदिवासियों को जेलों में ठूंस दिया गया,
यहां तक कि वकीलों और पत्रकारों तक को या तो इलाके से बाहर निकाल दिया गया या जेलों में डाल दिया गया,
और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को राज्य छोड़ने के लिए मजबूर किया गया,
लेकिन यह कोई पहली बार नहीं है की राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस दिया है,
इससे पहले भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,आदिवासी आयोग और सुप्रीम कोर्ट तक छत्तीसगढ़ सरकार के खिलाफ फैसले दे चुके हैं,
लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार की कानों पर कभी जूं तक नहीं रेंगी,
फिर अचानक क्या हो गया कि छत्तीसगढ़ सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नोटिस पर कार्यवाही करने की बात लिखकर भेजी है ?
सरकार द्वारा पत्र मैं अन्य बातों के अलावा यह कहा गया है कि कलेक्टर की अध्यक्षता में मानवाधिकारों की रक्षा करने के लिए एक समिति बनाई जाएगी,
और पुलिस वालों को मानवाधिकारों की रक्षा के लिए ट्रेनिंग दी जाएगी,
यह सब हम बहुत पहले से कहते रहे हैं,
लेकिन सरकार ने कभी कोई कार्यवाही नहीं करी,
फिर अचानक सरकार इतनी संवेदनशील कैसे हो गई ?
दरअसल यह आने वाले चुनाव का खौफ है,
छत्तीसगढ़ में एक साल बाद चुनाव होगा,
भाजपा की हालत पूरे देश में बहुत कमजोर है,
छत्तीसगढ़ में भी भाजपा को चुनाव हारने का डर बना हुआ है,
यही डर भाजपा को सही रास्ते पर आने के लिए मजबूर कर रहा है,
वरना कल्लूरी को भी इस तरह बस्तर से ना हटाया जाता,
लेकिन हमें छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को लिखकर भेजे गए आश्वासनों पर बिल्कुल विश्वास नहीं है,
कलेक्टर की अगुवाई में अगर कोई समिति बनाई जाती है तो वह मानव अधिकारों का की रक्षा कैसे करेगी ?
उदाहरण के लिए जगदलपुर में कलेक्टर अपनी फेसबुक पोस्ट में कम्युनिस्टों के खिलाफ़ लिखता है,
जबकि बस्तर में कम्युनिस्ट नेता मनीष कुंजाम, संजय पराते मानवाधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं और इन दोनों पर भाजपा के नेता और पुलिस वाले हमले करते रहते हैं,
ऐसे में कलेक्टर भी अगर कम्युनिस्ट नेताओं के खिलाफ फेसबुक पर पोस्ट लिखेगा तो उससे गुंडों का हौसला बढ़ेगा,
इस भाजपाई मानसिकता के कलेक्टर मानव अधिकारों की रक्षा के लिए सच में कुछ करेंगे हमें विश्वास नहीं है,
इसी तरह से पुलिस वालों को ट्रेनिंग देने का काम यदि वहां काम करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अलावा भाजपा के ही विचारक करेंगे,
तो पुलिस और भी ज्यादा क्रूर होती जाएगी,
छत्तीसगढ़ में आजकल सरकारी आयोजनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक आकर प्रवचन देते हैं,
भाजपा पुलिसवालों की ट्रेनिंग भी संघ के लोगों से ही करवाएगी,
इसलिए भाजपा सरकार द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दिए गए आश्वासन पूरी तरह धोखेबाज़ी है,

कल्लूरी साहब ज़रूर सच बोल रहे होंगे,

मुख्यमंत्री रमन सिंह जी,
कल्लूरी साहब ने कहा है कि बस्तर के आदिवासियों के मानवाधिकारों के लिये आवाज़ उठाने वाले शहरी सफेदपोशों को नक्सलियों की तरफ से पैसा मिलता है,
कल्लूरी साहब ज़रूर सच बोल रहे होंगे,
मेरी शिकायत यह है कि मुझे मेरा पैसा अभी तक नहीं मिला है,
मैं लम्बे समय से आर्थिक तंगी में चल रहा हूँ,
अगर सरकार मुझे बता दे कि मेरा पैसा कहां जमा कराया जा रहा है,
तो मैं उस पैसे का उपयोग कर सकूंगा,
बहुत धन्यवाद ,
सादर
हिमांशु कुमार

आन्तरिक सुरक्षा का बजट

भारत सरकार ने आन्तरिक सुरक्षा का बजट इस बार बहुत बढ़ा दिया है,
इसका मतलब बिल्कुल साफ है,
आदिवासी इलाकों में और ज़्यादा सैनिक भेजे जायेंगे,
सैनिक जंगलों में आदिवासियों को सुरक्षा देने के लिये नहीं भेजे जाते,
ये सैनिक आदिवासी की ज़मीन, जंगल और पहाड़ की रक्षा करने के लिये नही भेजे जाते,
बल्कि ये सैनिक इससे उलटे काम करने के लिये भेजे जाते हैं,
ये सैनिक आदिवासियों की ज़मीनों, जंगलों और पहाड़ों पर कब्ज़ा करने के लिये भेजे जाते हैं,
ताकि उन ज़मीनों, पहाड़ों और खनिजों को अमीर पूंजीपतियों की कम्पनियों को सौंपा जा सके,
सैनिक और बढ़ेंगे,
यानि आदिवासियों का दमन और अत्याचार अभी और बढ़ेगा,
पत्रकारों पर हमले बढ़ेंगे,
वकीलों, साहित्यकारों, मानवाधिकार कार्यर्ताओं को माओवादी कहने का चलन बढ़ जायेगा,
आदिवासी इलाकों में लोकतांत्रिक गतिविधियां और भी असंभव हो जायेंगी,
अभी भी जब आदिवासी विरोध प्रदर्शन के लिये बाहर आने की कोशिश करते हैं तो हज़ारो सिपाही जंगलों में ही आदिवासियों का रास्ता रोक लेते हैं,
मोदी छत्तीसगढ़ जाकर कहते हैं कि आदिवासी युवाओं को हथियार छोड़ कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेना चाहिये,
लेकिन लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वालों पर हमले करवाते हैं,
अभी अमीर पूंजीपतियों के लिये सत्ता और नाटक खेलेगी,
आपका ध्यान आदिवासी इलाकों में चलने वाले हमलों से हटाने के लिये हिन्दु मुस्लिम तनाव बढ़ाया जायेगा,
यह नक्सलवाद का मामला नहीं है,
आज़ादी के बाद से आज तक एक भी जगह बिना सिपाहियों की मदद के आदिवासियों की ज़मीन पर कब्जा हुआ ही नहीं है,
इसलिये गरीबों के बच्चों को सिपाही बना कर दूसरे गरीबों को मारने भेजा जा रहा है,
आगे की कहानी बहुत खून और आंसुओं से भरी है,
एक लम्बी लड़ाई के लिये कमर कस लीजिये,
हम इसे रोकने मे अपनी पूरी ताकत लगा देंगे,
हम समझते हैं इस सब को,
इसलिये जीतेंगे हम ही,

नक्सली समर्थक

जब मानवाधिकार कार्यकर्ता सरकारी सुरक्षा बलों और पुलिस द्वारा आदिवासियों की हत्या का मामला उजागर करते हैं,
तो भक्तगण तुरंत आकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से कहते हैं कि तुम तब क्यों नहीं बोलते जब नक्सली मारते हैं ?
आजकल भक्तगणों के साथ कुछ पुलिस वाले और अर्धसैनिक बलों के अफसर भी फेसबुक पर आकर हमसे ऐसी ही बातें कहते हैं,
हम नक्सलियों और सरकार को एक ही बराबर नहीं मान सकते,
ऐसा नहीं हो सकता कि हर बार सरकार की क्रूरता और बलात्कार पर सवाल उठाने के लिये हमें नक्सलियों की भी निन्दा करनी पड़ेगी,
हम एक बार स्पष्ट कर चुके हैं कि हम संवैधानिक राजनैतिक लड़ाइयों के समर्थक हैं,
इस लिये सरकार के अपराधों को उजागर करते समय हर बार उस बात को दोहराने की हमें कोई ज़रूरत नहीं है,
हम सरकार को टैक्स देते हैं, वोट देते हैं, कोर्ट में जाते हैं, मतलब हम सरकार का ही हिस्सा हैं,
अब मेरे वोट से, मेरे टैक्स के पैसे से तनख्वाह लेकर सिपाही अगर आदिवासी महिला से बलात्कार करेगा तो मुझे उस पर आपत्ति करने का अधिकार है या नहीं ?
मैं अगर आपत्ति करता हूँ कि मेरे वोट से बनी सरकार का सिपाही, मेरे टैक्स के पैसे की बन्दूक लेकर, मेरे पैसे की वर्दी पहन कर मेरे पैसे से तनख्वाह लेकर मेरे ही देश की आदिवासी लड़कियों से बलात्कार नहीं कर सकता,
तो मुझसे यह नहीं कहा जा सकता कि पहले तुम नक्सलियों के विरुद्ध बोलो, वर्ना हम तुम्हें नक्सली समर्थक घोषित कर देंगे,
बाज़ार में यदि कोई सिपाही किसी की जेब काट रहा हो,
और मैं उसे पकड़ लूं तो वह सिपाही यह नहीं कह सकता कि तुम पहले दुनिया के सभी जेबकतरों की निन्दा करो बाद में मुझे कुछ कहना,
जनता की ज़मीन बन्दूक के दम पर छीनना सरकारों का पुराना काम है,
यह काम तब भी चलता था जब नक्सलवादी नहीं थे,
और आज भी जहां नक्सलवादी नहीं हैं वहां भी पुलिस बन्दूकों के दम पर ही ज़मीन छीनती है,
राजधानी की नाक के नीचे भट्टा पारसौल में भी ज़मीन के लिये किसानों के घर जलाये गये थे,
सरकार अगर कानून तोड़ती तो इसका अर्थ है पूरा समाज कानून तोड़ता है,
अगर आप अपने सिपाहियों द्वारा किये जा रहे बलात्कारों के विरुद्ध आवाज़ नहीं उठाते,
तो इसका मतलब है आप बलात्कारों का समर्थन कर रहे हैं,
बलात्कारों का विरोध करने के लिये किसी नागरिक पर कोई शर्त नहीं थोपी जा सकती,
आप नागरिक से यह बिल्कुल नहीं कह सकते कि सरकारी बलात्कारों का विरोध करोगे तो हम तुम्हें नक्सली समर्थक मान लेंगे,
इसलिये तुम बस नक्सलियों के विरुद्ध बोलते रहो,
और इस दौरान सिपाही अडानी और अम्बानी के लिये ज़मीनें छीनने हेतु बेगुनाह आदिवासियों के सीने में गोलियां मारते रहें और उनकी बेटियों से बलात्कार करते रहें,

बामन की गिरफ्तारी

बामन का छोटा भाई भीमा और 14 साल की साली सुखमति बाज़ार से लौट रहे थे,
रास्ते में जंगल में पुलिस वाले आराम कर रहे थे,
पुलिस वालों ने सुखमती को पकड़ लिया,
सिपाहियों ने सुखमती के साथ सामूहिक बलात्कार किया,
इसके बाद सुखमति और भीमा को पकड़ कर थाने में लेकर आये,
अपना अपराध छिपाने के लिये सिपाहियों ने सुखमति और भीमा को गोली मार दी,
पुलिस ने मीडिया में बताया कि हमने वीरता पूर्वक दो नक्सलवादियों को मार गिराया है,
इसके बाद पुलिस ने भीमा के बड़े भाई बामन को बुला कर कहा कि सबको बताना कि तुम्हारा भाई और साली नक्सलवादी थे,
इसके बाद सोनी सोरी ने घटनास्थल का मुआयना किया और बामन से मुलाकात करी और मामले की शिकायत अदालत मे करने की सलाह दी,
बामन अदालत जाने के लिये घर से निकला,
रास्ते में पुलिस ने बामन को पकड़ा,
पुलिस वालों ने बामन को बुरी तरह पीटा,
पुलिस वालों ने चाकू से बामन के पाँव काटने की कोशिश भी की,
इसके बाद बामन को इसी रविवार को फर्जी नक्सली केस बना कर जेल मे डाल दिया,
बामन अभी दन्तेवाड़ा जेल में है,
हम अब बामन की ज़मानत की कोशिश करेंगे,

हनीफ पालीवाल

राजस्थान में मज़दूरों और युवाओं में काम करने वाले साथी कामरेड दुर्गा शंकर पालीवाल और मधु पालीवाल ने अपने बेटे का नाम हनीफ रखा,
सही भी है नामों पर तो मज़हबों की मिल्कियत नहीं होनी चाहिये,
हनीफ की शादी के वख्त दोस्तों को खाने पर बुलाने के लिये कार्ड देने का सोचा गया,
कार्ड वाले दुकानदार ने गणेश, ऊँ और स्वास्तिक वाले कार्ड दिखाने शुरू किये,
हनीफ ने कहा ये वाले नहीं चाहिये,
दुकानदार ने नाम पूछा,
हनीफ ने अपना नाम बताया,
दुकानदार बोला अरे पहले बताना चाहिये था ना,
दुकानदार ने चांद तारे और 786 वाले कार्ड दिखाने शुरू कर दिये,
हनीफ ने कहा मेरे पिता का नाम दुर्गा शंकर है,
दुकानदार बुरी तरह चकरा गया और बोला आपके लायक कार्ड तो बाज़ार में कहीं नहीं मिलेगा,
हनीफ ने खाली लिफाफे खरीदे और निमन्त्रण की चिट्ठी टाइप करवा कर भेज दीं,

सुखमती

सुखमती 14 साल की थी,
सुखमती की बड़ी बहन कमली की शादी उसी गांव में रहने वाले बामन से हुई थी,
सुखमती के गांव का नाम गम्फूड़ था,
गम्फूड़ उन तीन गांवों में से एक था जो सरकारी कंपनी एनएमडीसी की लोहा खदान प्रोजेक्ट के लिए विस्थापित हुए थे,
इन गावों की जमीनों पर से आदिवासियों के झोपड़े हटाकर उनकी खेती खत्म करवा कर भारत सरकार ने लोहा खोदना शुरू किया था,
और उन्हें जंगल में खदेड़ दिया गया था,
इन आदिवासियों से वादा किया गया था कि इन तीनों गांव का ऐसा विकास होगा जो सारे देश के लिए एक मॉडल बनेगा,
स्कूल होगा, आंगनबाड़ी होगी, सड़कें होंगी,
यह तब की बात है जब दिल्ली में नेहरू प्रधानमंत्री थे,
सरकार ने लोहा खोदना शुरू किया,
रोज़ कई सारी रेल गाड़ियों में भरकर लोहा विशाखापट्टनम समुद्र किनारे तक जाता था,
वहां से पानी के जहाजों में भरकर यह लोहा जापान भेज दिया जाता था,
सुखमती के गांव और बाकी के 2 गांव को सरकारी कंपनी एनएमडीसी ने गोद लिया था, और इनके सर्वांगीण विकास का वादा किया था,
सरकार वहां से लोहा खोदती रही,
लोहा खोदने के लिए बाहर से साहब लोग आकर कंपनी में नौकरी पाते रहे,
उनके लिए स्टाफ क्वार्टर बने, क्लब बने, सरकारी डाक बंगले बने,
ट्रक ड्राइवरों के क्वार्टर बने,
पूरा एक शहर बस गया,
लेकिन सरकार इन तीनों गावों का विकास करना भूल गई,
गांव में न कोई स्कूल खोला गया, न कोई आंगनबाड़ी, ना कोई स्वास्थ्य केन्द्र,
गांव के लोग सब्जी और जंगल से इकट्ठा करे हुए फल ले जाकर इन साहब लोगों को बेच देते थे,
कुछ लोग जंगल से सूखी लकड़ियां इकट्ठी करके बचेली और किरंदुल शहर में चलने वाले होटल ढाबों में बेच कर अपना घर चलाते थे,
सरकारी कंपनी एनएमडीसी लोहा खोदने के बाद पहले धोती थी बाद में रेल गाड़ी में लादती थी,
लोहा धोने के बाद जो लाल पानी बचता था,
वह लाल पानी इन गावों की तरफ बहा दिया जाता था,
लोहे के लाल पानी से गांव की नदी बर्बाद हो गई थी,
गाय बैल नदी का पानी पीकर जल्दी मर जाते थे,
लाल धूल फसल पर जम जाती थी इसलिये खेती करना भी मुश्किल हो गया था,
मच्छर बहुत थे, कई लोग हर साल मलेरिया से मर जाते थे,
विकास का मॉडल खड़ा होने की बजाय विकास के नाम पर धब्बा बन चुके थे यह तीनों गांव,
2OO5 में सरकार ने यहां सलवा जुडूम शुरू किया,
जिसके तहत और बड़ी-बड़ी कंपनियों को बस्तर में जमीने दी जानी थी,
इस बार तो सरकार को आदिवासियों से विकास का कोई वादा करने की जरूरत भी नहीं पड़ी,
सरकार ने आदिवासियों के गांव जलाने शुरू कर दिये,
भारी तादाद में सिपाही जंगलों में भर दिए गए,
जगह जगह पुलिस के कैंप बन गए,
राजस्थान, हरियाणा, तमिलनाडु और नागालैंड तक के सिपाही जंगलों में झुंड बनाकर घूमने लगे,
आदिवासी लड़कियों का घर से निकलना मुहाल हो गया,
एक रोज 14 साल की सुखमती अपनी बहन के देवर भीमा के साथ किरंदुल बाजार गई,
वहां से लौटते समय अपनी मां के लिए उसने ₹10 की जलेबी खरीदी थी,
रास्ते में भीमा आगे-आगे था सुखमति पीछे-पीछे थी,
रास्ते में सुखमति ने देखा जंगल में सिपाही फैले हुए हैं,
सिपाहियों ने सुखमति और भीमा को पकड़ लिया,
भीमा को पकड़ कर एक पेड़ से बांध दिया गया,
सिपाही सुखमति के साथ छेड़खानी करने लगे,
दो सिपाहियों ने सुखमति के कपड़े फाड़ दिए,
सिपाहियों ने सुखमति को रौदना शुरु किया,
सुखमती संख्या भी भूल गई कि उसे कितने सिपाहियों ने रौंदा,
जी भर जाने के बाद सुखमती और भीमा को थाने ले जाया गया,
सिपाहियों ने कहा अब इनका क्या करें ?
छोडेंगे तो यह बाहर जाकर सब कुछ बता देंगे,
साहब ने कहा गोली से उड़ा दो और वर्दी पहना दो,
अगले दिन अखबारों में छापा गया हमारे सुरक्षाबलों ने वीरता का परिचय देता देते हुए दो खूंखार माओवादियों को ढेर कर दिया है,
सुखमति और भीमा की लाशें उसके परिवार वालों को दे दी गई,
भारत के विकास का जो वादा चाचा नेहरू ने किया था,
उसके परखच्चे उड़ चुके थे,
विकास के नाम पर सरकारी सिपाहियों द्वारा रौंदी गई 14 साल की किशोरी की लाश गांव के बीच में पड़ी थी,
भीमा का बड़ा भाई बामन पिछले हफ्ते अदालत जाने के लिये गांव से निकला,
रास्ते में सिपाहियों ने बामन को पकड़ कर बुरी तरह पीटा और चाकू से उसका पांव काटने की कोशिश करी,
बामन को इसी रविवार जेल में डाल दिया गया,
मुझे खबर मिली है गांव वालों नें सुखमति की लाश का दाह संस्कार नहीं किया है,
गांव के आदिवासी चाहते हैं कि मीडिया वाले आयें और विकास के नाम पर उनकी बेटियों की दुर्गति देख कर जायें,
मैनें अपने कुछ पत्रकार मित्रों को वहां जाने के लिये फोन भी किया, लेकिन ज्यादातर पत्रकारों को उनके चैनलों ने चुनाव के समाचार लाने में लगाया हुआ है,
सुखमती की जगह अपनी बेटियों को रखकर सोचता हूँ तो दिल कांप जाता है,
यह कौन सी जगह आ गये है हम ?

28 आदिवासी महिलाओं की याचिका

सुरक्षा बलों द्वारा सामूहिक बलात्कार की शिकार 28 आदिवासी महिलाओं की याचिका छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्वीकार कर ली है ၊
कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर दिया है,
मानवाधिकारों के लिये काम करने वाले संगठन ह्यूमन राइट्स ला नेटवर्क के वकील किशोर नारायण ने महिलाओं की तरफ से याचिका दायर करी है,
राष्ट्रीय आदिवासी आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी जांच में स्वीकार किया था कि प्राथमिक साक्ष्य मौजूद है जिनसे पता चलता है कि सुरक्षा बलों के सिपाहियों ने महिलाओं से दुराचार किया है ၊
हाई कोर्ट की आर्डर शीट संलग्न है ၊


इस उम्र में साइकिल यात्रा

लोग पूछते हैं आप इस उम्र में साइकिल पर लोगों से चर्चा करने और माहौल बदलने निकले हैं ?
मैं कहता हूं युवा वह है जिसे अभी भी यकीन है कि हालात बदल सकते हैं,
और बूढ़ा वह है जो यह मान कर उम्मीद छोड़ देता है कि अब दुनिया नहीं बदल सकती,
लोग कहते हैं क्या आपके साइकिल पर घूमने से दुनिया बदल जायेगी ?
मैं कहता हूँ क्या मेरे घर में बैठे रहने से दुनिया बदल जायेगी ?
हम जिन्दगी के आखीर में नये बच्चों से कह तो पायेंगे कि हमने हालात बदलने की कोशिशें करी थीं,
अब तुम्हारी बारी है,
अगर हमारी पीढ़ी ही सड़क पर नही उतरेगी,
तो नई पीढ़ी सड़कों पर उतर कर लड़ना किसे देख कर सीखेगी ?

विजयपुरा

आज विजयपुरा गांव में ठहरा हूं,
गांव कई मामलों में अनोखा है,
सबसे पहले इसी गांव के सरपंच कालूराम सालवी ने नेरेगा कार्यक्रम मे जाब कार्ड बनाये थे,
जॉब कार्ड का यह प्रयोग पूरे राजस्थान मे फैलाया गया,
राजस्थान के बाद यह पूरे भारत मे फैला था,
कालूराम जी दलित हैं लेकिन सामान्य सीट पर चुनाव जीते,
कालूराम जी बताते हैं मैने चुनाव में सिर्फ 95 रू पैम्फलेट छपवाने में खर्च किये थे,
कालूराम जी मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़ कर सूचना के अधिकार और लोगों की ताकत बढ़ाने का काम कर रहे हैं,

देवडूंगरी

आज साइकिल चलाते हुए राजस्थान के राजसमन्द ज़िले के देवडूंगरी गांव में पहुंचा हूं,
यहां एक जनसंगठन के केन्द्र में ठहरा हूँ,
इस जन संगठन का नाम मजदूर किसान शक्ति संगठन है,
यह संगठन बहुत सारी बड़ी नीतियों और कार्यक्रमों को शुरू करवाने के लिये जिम्मेदार है,
भारत में सूचना का अधिकार यानी आरटीआई कानून इसी संगठन के प्रयासों से लागू किया गया था,
सरकार को नेरेगा कार्यक्रम और सिटिजन चार्टर का कानून भी इसी संगठन के प्रयासों से लागू करना पड़ा था,
संगठन की शुरूआत गांव वालों के साथ मिलकर अरूणा रॉय ने करी थी,
अरूणा रॉय पहले आईएएस अधिकारी थीं,
जिसे त्याग कर उन्होंने गांव में रहकर काम करना शुरू किया,
उनके साथ निखिल डे अपना अपनी ऐशो आराम छोड़ कर गांव में काम करने आ गये,
स्थानीय साथी शंकर सिंह और सैंकड़ों ग्रामीण युवाओं ने मिल कर गांव के लोगों के आधिकारों के लिये संघर्ष किया,
एक सिद्धांत के तहत यह तय किया गया था कि संगठन में कोई भी स्थानीय मज़दूर को मिलने वाली न्यूनतम मज़दूरी से ज़्यादा वेतन नहीं लेगा,
अरुणा रॉय और निखिल डे भी आज तक एक साधारण मजदूर को मिलने वाली मजदूरी लेकर 24 घन्टे समाज के लिये काम करते हैं,
यदि आप संगठन के लोगों का रहन सहन का स्तर देखेंगे तो आप विश्वास नहीं कर पायेंगे कि कोई इतनी ज़्यादा सादगी से कैसे रह सकता है,
देश भर से कानून, प्रशासन और समाज सेवा की पढ़ाई करने वाले कालेज अपने विद्यार्थियों को यहाँ सीखने भेजते हैं,
अरूणा रॉय को मैगसेसे पुरस्कार मिल चुका है, और वे UPA सरकार की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य रह चुकी हैं,
आज मुझे देश भर से यहां आये हुए बहुत सारे युवाओं से बात करने का मौका मिला है,

नया गाँव

आज साइकिल चलाते हुए राजसमन्द और अजमेर जिले की सीमा पर स्थित नया गांव में पहुँचा,
मेज़बान एक सास बहु थीं,
बहु की उम्र 27 साल,
आठ माह पहले पति की मृत्यु हो गई,
साल भर के बच्चे को छोड़ कर नेरेगा में मज़दूरी करने जाती है,
सरकार को इस साल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सूखाग्रस्त क्षेत्रों में नेरेगा मे सौ की बजाय डेढ़ सौ दिन काम देना था,
लोगों ने 135 दिन काम किया तो मोदी जी को सपना आया कि इन लोगों को सौ दिन से ज़्यादा का पैसा मत दो,
अब राजस्थान की भाजपा सरकार गरीब विघवाओं और मज़दूरों को मज़दूरी में दिया गया पैसा वापिस वसूल रही है,
आप अगर गांव में लोगों से बात करेंगे तो आप को महसूस होगा कि सरकार लोगों के साथ कितनी क्रूर और उनकी दुश्मन है,
एक सरकार उद्योगपतियों को पांच लाख करोड़ की सब्सिडी दे सकती है,
दूसरी तरफ वही सरकार गांव वालों की काम करी हुई मज़दूरी भी वापिस वसूल रही है,
इसे कहते हैं क्रूरता की इंतेहा,
गांव में पानी एक किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है,
पानी को घी की तरह संभाल कर खर्च करना पड़ता है,
अगली बार शावर के गर्म पानी के नीचे खड़े होकर सोचियेगा ज़रूर,
सास का नाम गेंदी बाई है,
वे गांव की महिलाओं में जागरूकता जगाने का काम करती हैं,
वे बताती हैं 18 साल पहले भंवरी बाई के साथ दबंगों के सामूहिक बलात्कार का विरोध करने वे धरना देने जयपुर गई थीं,
तब भैरों सिंह शेखावत की भाजपा सरकार थी,
तब गेंदी बाई ने पुलिस की लाठियां खाई थीं और जेल गई थीं,
गेंदी बाई ने बताया कि सुबह तीन बजे उठकर नज़दीक के हैण्ड पम्प पर 2 मटकी पानी निकलता है और फिर पानी खत्म हो जाता है,
लेकिन वो पानी खाना बनाने या पीने लायक नहीं है,
उन्होने मुझे वो पानी दिखाया,
गांव में मोबाइल सिग्नल नहीं आता,
मैनें कहा मोदी जी का कैशलेस यहाँ कैसे चलेगा,
यह बात तो गांव वालों को समझ में नहीं आई,
लेकिन गांव वालों ने बताया नोटबन्दी के बाद शहरों में काम करने वालों की मजदूरी 3OO से घट कर 8O रूपये हो गई थी,
क्योंकि शहर में सेठों के पास भी नगद पैसा नहीं था,
हमारी फेसबुक की दुनिया और भारत की ज़मीनी हकीकत में बहुत दूरी है,
हम यहां जो चर्चा करते है उनमें वो बातें शामिल ही नहीं होतीं जो इस देश के करोड़ों लोग रोज भोगते हैं,
मुझे आश्चर्य यही है कि ये लोग यह सब कुछ सह क्यों रहे हैं ?
ये लोग बग़ावत क्यों नहीं कर रहे ?

बालेन्दु स्वामी

क्या यह संभव लगता है कि एक गैर भाजपाई सरकार के शासन में एक पूरे परिवार पर इतने हमले किये जाएं कि उन्हें मुल्क छोड़ कर जाना पड़े,
उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में हमारे मित्र बालेंदू स्वामी रहते थे,
वे पहले एक धर्म गुरु थे,
उनका वृंदावन में परिवारिक ज़मीन पर एक आश्रम था,
स्वामी बालेंदु ने ईश्वर के विषय में सत्य जानने के लिये लम्बे समय तक प्रयोग किये,
अन्त में उन्होंने घोषित किया कि वे ईश्वर के अस्तित्व में अब विश्वास नहीं करते,
उनकी पत्नी रमोना एक जर्मन महिला हैं,
स्वामी बालेंदु सभी धर्मों की कुरीतियों के विरूद्ध लिखने लगे,
पिछले साल देश भर में फैले वैज्ञानिक समझ रखने वाले नास्तिक दोस्तों ने तय किया कि हम सब स्वामी बालेंदु के आश्रम में इकट्ठा होंगे,
इस कार्यक्रम के शुरु होने के समय इस पर हमला कर दिया गया,
हमला करने वालों में समाजवादी पार्टी और भाजपा के नेता एक साथ शामिल थे,
प्रशासन इन हमलावरों का साथ दे रहा था,
प्रशासन ने बुलडोजर लाकर बालेन्दु के आश्रम के बाहर तोड़ फोड़ करी,
प्रशासन ने नास्तिक मित्र मिलन ना करने का हुक्म दिया,
पुलिस अधिकारी ने आकर बालेन्दु से पूछा आप यह राष्ट्र विरोधी कार्य क्यों कर रहे हैं ?
मैं यह सुन कर दंग रह गया,
क्योंकि आपका आस्तिक होना या नास्तिक होना अपनी मर्जी है,
कोई भी कानून आपकी धार्मिक आस्था तय नहीं कर सकता,
स्वामी बालेन्दु को जेल मे डालने की कोशिश करी जाने लगीं,
स्वामी बालेन्दु इस सब की सूचना देने वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से मिले तो उसने उन्हें और रमोना को गालियां दी और बाहर निकाल दिया,
अपने परिवार पर चारों तरफ से हमलों और गिरफ्तारी की आशंका के बीच स्वामी बालेन्दु ने भारत छोड़ दिया,
उन्होंने लिखना बन्द कर दिया,
यह सब पढ़ कर ऐसा लग रहा है जैसे यह सब चौदहवीं शताब्दी के किसी कबीले में हो रहा है,
लेकिन यह इक्कीसवीं शताब्दी मे भारत मे गैर भाजपा समाजवादी शासन मे हुआ,
हमें खुद को पहचानना ज़रूर चाहिये,
वर्ना हम असल में होंगे कुछ और,
लेकिन खुद को समझेंगे कुछ और ही,
यह घटना हमारे सामने हमारी हकीकत की पोल खोलती है,

साइकिल यात्रा


हवाई अड्डा के लिए गाँव उजाड़

साइकिल यात्रा करते हुए एक ऐसे गांव में पहुंचा हूँ जिसे सरकार किसी भी क्षण उजाड़ सकती है,
सरकार यहाँ हवाई अड्डा बनाना चाहती है,
हांलाकि यहां हवाई अड्डे की कोई ज़रूरत नहीं है,
पहले से बना हुआ जयपुर हवाई अड्डा सिर्फ 100 किलोमीटर दूर है,
नियमानुसार एक हवाई अड्डे से दूसरे हवाई अड्डे की दूरी कम से कम 250 किलोमीटर होनी चाहिये,
पहले यह गांव हवाई अड्डे से बाहर था,
लेकिन रसूखदार नेताओं ने अपनी ज़मीन बचाने के लिये हवाई अड्डे की दिशा बदलवा दी,
केन्द्र सरकार ने गांव वालों से वादा किया था कि गांव को नहीं उजाड़ा जायेगा,
लेकिन बाद में सरकार ने कहा कि गांव गैरकानूनी है और 2009 में बसा है,
गांव वालों का कहना है हमारे पूर्वज ब्रिटिश सेना और फिर भारतीय सेना में शामिल रहे हैं,
हमारा गांव 500 साल पुराना है,
गांव का नाम ढांणी राठौरान है,
ज़िला अजमेर है,
इस गांव के नाम पर पुराना रेलवे स्टेशन था,
गांव के लोग अपनी ज़मीन बचाने के लिये तीन साल से गांव के प्रवेश मार्ग पर धरना दे कर बैठे हैं,
गांव की महिलायें दो बार लम्बे समय तक अनशन भी कर चुकी हैं,
सरकार ने अनशन समाप्त करने बड़े बड़े वादे तो किये,
लेकिन एक का भी पालन नहीं किया,
गांव वाले अपनी जान देने को तैयार हैं,
लेकिन गांव छोड़ने को तैयार नहीं हैं,
कल इस गांव में गायाें का सम्मेलन होगा,
हज़ारों गाऐं कल खुद के प्राण बचाने के लिये प्रधानमंत्री मोदी से प्रार्थना करेंगी,
इस सम्मेलन में गांव की महिलायें और बच्चे भी शामिल रहेंगे,
गांव के लोगों का मुख्य धन्धा गाय का दूध बेचने का है,
अगर गांव को उजाड़ दिया गया तो गायें भूख से मर जायेंगी,
करीब एक हज़ार मोर भी मर जायेंगे,
कल होने वाले गाय सम्मेलन में मैं भी मौजूद
रहूँगा,
सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा रॉय, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता कैलाश मीणा भी सम्मेलन में शामिल होंगे,
आस पास के जिलों से हज़ारों लोग इस गांव के साथ मुसीबत में साथ देने आ रहे हैं,
सरकार द्वारा भारतीय सेना के अनेकों सैनिकों का घर भी तोड़े जाने की तैयारी कर ली गई है,
कल अनेक सैनिक भी अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये अपने प्राण न्यौझावर करने का संकल्प दोहरायेंगे,

सरकार अपराधी होने के बावजूद मज़े में है

छत्तीसगढ़ में मैंने मानवाधिकार हनन के जो भी गंभीर मामले उठाये हैं उनमे से एक में भी छत्तीसगढ़ सरकार आज तक हिमांशु कुमार को झूठा साबित नहीं कर पायी .
अलबत्ता हिमांशु कुमार ने छत्तीसगढ़ सरकार को अनेकों मामलों में झूठा साबित कर दिया है .
माटवाडा में पुलिस द्वारा तीन आदिवासियों की चाकू से आँखें निकाल कर मार डाला था .
मैं इस मामले को हाई कोर्ट में ले गया .
डीजीपी ने कहा हिमांशु नक्सली है इसलिए सरकार को बदनाम करने के लिए झूठी बातें बना रहा है .
लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जब मामले की जांच करी तो साफ हो गया कि सरकार ही झूठ बोल रही थी .
इस मामले में तीन पुलिस आधिकारियों को जेल में डालना पड़ा .
सिंगारम में उन्नीस आदिवासियों की हत्या पुलिस ने करी .
मैं इस मामले को हाई कोर्ट में ले गया .
सरकार ने बदला लेने के लिए मेरे आश्रम पर बुलडोजर चला दिया .
लेकिन पिछले साल मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिख दिया है कि वाकई में मारे गए लोग निर्दोष आदिवासी ही थे .
सोनी सोरी के मामले में सोनी के साथ साथ हमें भी नक्सली कहा गया .
अब साफ़ हो गया है सोनी निर्दोष थी .
बल्कि सरकार ही अपराधी है .
लेकिन मैं सच्चा होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में काम नहीं कर सकता .
सरकार अपराधी होने के बावजूद मजे में है .

एयरपोर्ट के लिए गांव उजाडो

राजस्थान में किशनगढ़ में बनने वाले हवाई अड्डे के लिये उजाड़े जाने वाले गांव ढाणी राठौरान में सम्मेलन हुआ ၊
सम्मेलन में पूरे देश से आये लोगों ने भाग लिया ၊
ग्रामीणों ने बताया कि सरकार ने उनके साथ सरासर बेईमानी और धोखाधड़ी करी है ၊
जब भी ग्रामीण विरोध करते हैं उन्हें फर्जी वादे दे कर भगा दिया गया ၊
इस बार तो सरकार गुण्डागर्दी पर ही उतर आयी है ၊
पुलिस के डन्डे के बल पर गांव वालों को गांव से उजाड़ने की तैयारी करी जा रही है ၊
अगर सरकार ने ऐसी जुर्रत करी तो गांव वाले अपनी जान दे देंगे पर ज़मीन से नहीं हटेंगे ၊
भयानक खून खराबा होने की आशंका है ၊ गांव वालों का देश भर के लोग साथ देंगे ၊ दिल्ली, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लोग इस गांव में आ जायेंगे ၊
सम्मेलन में पीयूसीएल से अनन्त भटनागर, डीएल त्रिपाठी, सिस्टर गीता, ओपी रे , भंवरी देवी किसान मोर्चा, नोरती बाई पूर्व सरपंच, हरमाड़ा, नोरत राम तिलोनिया, सांवल राम यादव नीम का थाना, कैलाश मीणा, राज्य संयोजक एनएपीएम, राधेश्याम शर्मा कोटपुतली, कपिल सांखला, किसान मजदूर संगठन भीम से निखिल डे और मुकेश जी, मौजूद रहे और हमेशा साथ रहने का हौंसला दिया ၊

भारत की अदृश्य आबादी

भारत के गांवों में करोडों लोग ऐसे हैं जिनके पास ज़मीन नहीं है,
ये लोग कुछ बकरी या गाय या भैंस पाल कर खेतों की मेड़ों पर, खाली पड़े चरागाहों मे, गांव के पास की पहाड़ियों में चरा लेते हैं और अपना गुजरान कर रहे हैं,
कुछ लोग इन जानवरों का गोबर इकट्ठा कर के उनका कन्डे, गोईठा, या उपले बना कर बेच कर ही पेट पाल रहे हैं,
कुछ लोग समुन्दर या नदियों में मछली पकड़ कर गुजारा करते हैं,
ये लोग अपना पैसा बैंक में नहीं रखते,
बैंक इन को कर्ज़ देने लायक नहीं मानते,
ये खुद को अनागरिक मान कर खुद के लिये कुछ भी अधिकार मांगे बिना जीते हैं और चुपचाप मर जाते हैं,
इनके ना तो कोई मानवाधिकार होते हैं ना कोई आर्थिक या राजनैतिक अधिकार,
लेकिन यही लोग आपकी अर्थव्यवस्था को मन्दी से बचा लेते है,
क्योंकि यही करोड़ों लोग अरबों रुपयों का गुड़ चीनी चाय पत्ती आटा चावल साइकिल, ब्लेड कपड़ा खरीदते हैं,
लेकिन फिर भी ये करोड़ों लोग आपकी अर्थ व्यवस्था के बाहर हैं,
इनके रहते आपके उद्योग चलते रहते हैं, आपको रोज़गार मिलता रहता है,
जब कभी अमीर पूंजीपतियों के लिए किसानों की ज़मीन छीनी जाती है,
तो ये लाखों लोग बिना मुआवज़े या पुर्नवास के भूख गरीबी बीमारी कुपोषण और मौत के मुंह में धकेल दिये जाते हैं,
यह सीधे सीधे जनसंहार है,
ये लोग मूल रूप से दलित आदिवासी और घुमंतु जातियां हैं,
हम विकास के नाम पर इन करोड़ों लोगों की हत्या कर देंगे,
आजकल अपनी साइकल यात्रा में मैं इन लोगों से मिल रहा हूँ, चर्चा कर रहा हूं, इनकी झोपड़ी टपरी में खाना खा रहा हूँ, सो रहा हूँ,
ये बहुत शानदार और दिलदार लोग हैं,
यकीन मानिये ये बिल्कुल हमारे आपके जैसे ही हैं,
नोटबन्दी दरअसल इन जैसे लोगों की छोटी बचत को बैंक में लाने के लिये थी,
इनकी बचत को ही अमित शाह पैरेलल अर्थव्यवस्था कहता है,
भारत की कई परतें हैं,
भारत को जानने के लिये एक जीवन बहुत छोटा है

कब्रिस्तान और चुनाव

प्रधानमंत्री ने कल उत्तर प्रदेश में कब्रिस्तान बनाम श्मशान वाला शर्मनाक भाषण दिया है,
लेकिन इस देश में कुछ और भी लोग हैं,
कुछ लोगों को मरने के बाद ना कब्रिस्तान चाहिये ना श्मशान,
मेरे पिता मरे तो उनका शरीर मेडिकल कालेज को दान दे दिया गया,
मैने भी देह दान का शपथ पत्र भर कर अपने बेटियों को मेरे शरीर को भी ऐसे ही मेडिकल कालेज को सौंप देने को कह दिया है,
मेरे परिवार में मेरी पत्नी पंजाबी खत्री है, मेरे एक बहनोई मुस्लिम हैं दूसरे आदिवासी, एक दामाद सिख हैं, एक पुत्रवधु इसाई,
हमारे घर में सारे त्यौहार भी मनाये जाते हैं,
मोदी जी चुनावी भाषणों में हम लोगों की भावनाओं का ख्याल क्यों नहीं रखते ?
ये हिन्दुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़का कर चुनाव क्यों जीतना चाहते हैं ?
ये समाज को नफरत और लड़ाइयों वाले युग में धकेल कर देश का क्या भला करना चाहते हैं ?

समानता ही प्रगति है

समाज में सभी उत्पादक हैं .
सब कुछ ना कुछ उत्पादन करते हैं .
किसान अनाज का उत्पादन करता है .
मजदूर फैक्ट्री में कपडे या कार का उत्पादन करता है .
उसी फैक्ट्री में इंजीनियर का काम भी उत्पादन का एक रूप है .
एक कम्पनी के क्लर्क और सीईओ का काम भी एक तरह का उत्पादन है .
ड्राइवर का गाड़ी चलाना उत्पादन है . पाइलेट का जहाज़ उड़ाना उत्पादन है . सफाई कर्मचारी का सड़क या शौचालय साफ़ करना उत्पादन है .
सारे उत्पादन समाज के लिये ज़रूरी हैं . इन सभी उत्पादकों की जीवन की आवश्कताएं भी बराबर हैं .
इसलिये सबकी मजदूरी ज़रूरत के अनुसार बराबर होनी चाहिये .
ताकि समाज के ये सभी सदस्य अपनी ज़रूरतों को बराबर तरीके से पूरा कर सकें .
सभी बराबर सम्मान पा सकें और इन सभी के संताने एक सामान शिक्षा , एक समान इलाज और एक सामान जीवन की स्तिथियाँ पा सकें .
विभिन्न उत्पादकों के आपसी सम्बन्ध अगर एक दूसरे के शोषण पर आधारित होंगे तो समाज में असमानता, अमीरी, गरीबी , दुख बीमारी भूख रहेगी .
लेकिन अगर समाज हर काम के लिये बराबर मजदूरी का सिद्धांत स्वीकार कर लेता है तो समाज से सभी लोगों को एक सामान जीवन स्तर का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है .
कम मजदूरी पाने वाला गरीब इस समानता के सिद्धांत को मानने के लिये तैयार है .
लेकिन जिन्हें थोड़ी मेहनत के बदले अधिक मुनाफा मिलता है वे अमीर लोग समानता के सिद्धांत से नफरत करते हैं .
धर्म ने समानता का उपदेश दिया अमीरों के समाज ने उसे नहीं माना .
लोकतन्त्र भी समानता के सिद्धांत की बात करता है पर अमीर समाज ने लोकतन्त्र की बात भी नहीं मानी .
इस सब को देख कर कुछ लोग कहने लगे कि ये कम मेहनत से ज़्यादा कमाने वाले अमीर लोग समानता के सिद्धांत को समझाने से नहीं मानेंगे . इनको ज़बरन बदलना पडेगा .
इससे समाज में झगड़ा पैदा हो गया है .
इसे राज्य खुद के लिये सबसे बड़ा खतरा मानता है .
और चूंकि कम मेहनत से ज़्यादा कमाने वाले अमीर लोग ही सरकार पर हावी होते हैं इसलिये ये अमीर लोग समानता की कोशिश करने वालों को अपना दुश्मन मान कर उन पर सरकारी पुलिस की सहायता से हमला कर के उन्हें समाप्त करने की कोशिश करते हैं .
तब समानता की कोशिश करने वाले सरकार पर ही कब्ज़ा करने की कोशिश करते हैं .
सरकार पर कब्ज़ा करने की कोशिश करने वालों का पहला सामना सरकार की पुलिस से ही होता है इसलिये ये पुलिस पर हमला करते हैं .
लेकिन अमीर लोग गरीबों को मजदूरी का लालच देकर अपनी पुलिस में काम करने के लिये भर्ती करते जाते हैं .
इस तरह गरीब ही गरीब से लड़ते रहते हैं .
इस तरह से समाज की असमानता हथियारों के दम पर चलती रहती है .
इस तरह समाज का पूरा आर्थिक ढांचा हिंसा पर आधारित हो जाता है .
आर्थिक ढांचे के आधार पर ही सामाजिक ढांचा बनता है
इस सामाजिक ढांचे में पैसे वाला ज़्यादा इज्ज़त वाला ताकतवर और ऊंचा माना जाता है.
इस तरह यह मूलतः यह सामाजिक ढांचा भी हथियारों के दम पर ही टिका हुआ है .
इस आर्थिक और राजनैतिक ढांचे को सरकार बनाये रखने का वादा करती है.
इस तरह हमारा पूरा आर्थिक सामाजिक और राजनैतिक ढांचा ही हथियारों के दम पर चलाया जाता है
इस ढांचे को कम मेहनत करने वाले अमीर शक्तिशाली लोगों द्वारा मेहनत करने वाले गरीब लोगों पर जबरन थोप कर रखा जाता है
यह ढांचा समाज के समानता और न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है
यह ढांचा असभ्य है , क्रूर ,हिंसक और अवैज्ञानिक है .
इसके ढांचे के रहते समाज में समानता , न्याय , चैन, सुख और शांति नहीं आ सकती .
जो लोग इसी ढांचे के रहते विकास और शांती की कल्पना कर रहे हैं वे विकास के नाम पर अधिक असमानता और उसके परिणाम स्वरूप और अधिक अशांति की तरफ बढ़ रहे हैं .
इस अन्याय के कारण बढ़ने वाली अशांती बड़े युद्ध में बदल सकती है .
बड़े हथियारों से भरी इस दुनिया में ऐसा कोई भी युद्ध मानवजाति के अस्तित्व को मिटा सकता है .
इसलिये असमानता पर आधारित यह समाज मनुष्य जाति के अस्तित्व के लिये खतरा हैं
इसलिये जो लोग समानता के लिये काम कर रहे हैं वे दरअसल मानवजाति के अस्तित्व को बचाने के लिये काम कर रहे हैं .
मनुष्य जाति का भविष्य समानता और न्याय में ही है
असमानता और अन्याय मनुष्य जाति के अस्तित्व के लिये खतरा हैं

श्मशान और चुनाव

श्मशान को चुनाव का मुद्दा बनाया जा सकता है ,
लेकिन उसके लिये मुसलमानों के कब्रिस्तान से लड़ाई की ज़रूरत नहीं है,
बल्कि हिन्दुओं के बीच मौजूद बुराई के खिलाफ लड़ाई की ज़रूरत है,
गांवों में अलग अलग जातियों के अलग अलग श्मशान हैं,
दलितों के श्मशानों पर दबंग जातियों के भू माफिया कब्ज़े कर रहे हैं,
दलितों की कोई सुनवाई नहीं करता,
कई मामलों में दलितों पर दबंग जातियों ने इस लिये हमले किये क्योंकि दलितों ने बरसते पानी में अपने बिना शेड वाले श्मशान की बजाय बड़ी जातियों के श्मशान में अपने स्वजनों के शवदाह करने की कोशिश करी,
आपको श्मशान को राजनीति का मुद्दा ज़रूर बनाना चाहिये,
आप अपने भाषण में कहिये अपने अनुयायी स्वर्ण हिन्दुओं से,
कि वे दलितों को भी अपने श्मशान प्रयोग करने दें,
आप हिंदुओं के हितैषी हैं तो हिंदुओं में सुधार लाइये,
हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़वाने से हिन्दुओं का क्या भला होगा ?
हिन्दुओं में जातिवाद खत्म करवाइये,
मोदी जी आप हिन्दुओं के हितैषी हैं या दुश्मन ?
आपको तो सही राजनैतिक मुद्दा चुनना भी नहीं आता,

संविधान को ना मानना राष्ट्रद्रोह

भारत एक राष्ट्र है .
राष्ट्र में जिसने भी जन्म लिया उसे जन्म से ही कुछ अधिकार मिलते हैं .
उसे जन्म से ही इस राष्ट्र में जिंदा रहने का अधिकार है .
उसे जन्म से ही भोजन का अधिकार है .
उसे जन्म से ही इसमें रहने का अधिकार है .
लेकिन अगर एक बच्चे ने मुंबई की झोंपडपट्टी के किसी गरीब परिवार में जन्म लिया है.
और जब उसकी झोंपड़ी एक अमीर बिल्डर सरकारी पुलिस की मदद से तोड़ता है तब वह उस बच्चे का संवैधानिक हक़ छीन रहा होता है ,
और इस तरह संविधान तोड़ने में सरकार उस बिल्डर की मदद कर रही होती है .
जब कोई पुलिस अधिकारी किसी महिला की कोख में पत्थर भरता है और आप महिला का साथ देने की बजाय उस पुलिस अधिकारी को इनाम देते हैं,
आप अगर संविधान की दुहाई देते हैं और संविधान के मूल सिद्धांत को ठुकरा देते हैं तो आप बेईमानी कर रहे होते हैं .
संविधान और कुछ नहीं है बस वह हर नागरिक की बराबरी की घोषणा है .
अगर आप उसे नहीं मानते तो आप ही संविधान द्रोही है .
फिर भले ही आप राष्ट्रपति ही क्यों ना हों .

रवीश का कार्यक्रम

अभी रवीश का कार्यक्रम देखने का मौका मिला,
उसमें फर्ज़ी मुठभेड़ों और निर्दोष लोगों को फंसाये जाने के मामलों की चर्चा हो रही थी,
इनमें मुसलमान पीड़ित, सिख और हिन्दु पीड़ित भी थे,
हम सब जानते हैं ज़्यादातर फर्ज़ी मुठभेडें पुलिस वाले तरक्की और इनाम के लालच में करते हैं,
अलबत्ता मुसलमानों को फ़र्जी मामलों में फंसाने और मारने का काम हिन्दुओं को आतंकवाद का हव्वा दिखा कर वोट बटोरने के लिये भी किया जाता है,
लेकिन रवीश के कार्यक्रम में मुझे एक कमी लगी,
रवीश ने एक भी मामला आदिवासियों का शामिल नहीं किया,
19 आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ में मारने का सिंगारम मामला मेरे द्वारा हाईकोर्ट में डाला गया,
बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नें माना था कि हाँ वह एक फर्जी मुठभेड़ थी,
माटवाड़ा में 3 आदिवासियों की आंखे चाकू से बाहर निकालने के बाद उन्हें पीट पीट कर मारने का मामला मेरे द्वारा कोर्ट पहुंचाया गया था,
जिसमें बाद में तीन पुलिस वालों को जेल में भी डाला गया था,
इसके अलावा साढ़े पांच सौ केस मैने सुप्रीम कोर्ट को सौंपे थे जिनके लिये मै आज भी इन्साफ का इन्तज़ार कर रहा हूँ,
मुझे आदिवासियों के मामले शामिल ना किये जाने पर रवीश से कोई शिकायत नहीं है,
मैं बस यह कहना चाहता हूँ कि आदिवासियों की हत्या का मामला पुलिस वालों की गलती और अपराध का मामला नहीं है,
बल्कि आदिवासियों को तो जान समझ कर हम पूरे होश में मार रहे हैं,
ताकि उनकी ज़मीनों, जंगलों और खनिजों पर कब्ज़ा कर के हम अपनी अय्याशी का स्तर और बढ़ा सकें,
आदिवासी की हत्या पूरे भारतीय संभ्रांत वर्ग के अपराधिक चरित्र में ढल जाने की कहानी है,
उस कहानी का पर्दाफाश ज़रूरी है,