Monday, December 5, 2016

प्रदूषण


ऐसा कीजिये, पहले तो किसानों की ज़मीनें छीन कर कारखाने लगाइये ,
आदिवासियों का जंगल काट डालिये ,
खूब सारी कारें खरीदिये,
अलमारियां भर के कपड़े, महंगी शराबें, महंगे परफ्यूम, एयर कंडीशन्ड घर बढ़ाते जाइये ,
जो भी कोई सादगी, ज़रूरत भर उपभोग, मानवाधिकार, जंगल की रक्षा की बात करे ,
उसे नक्सली कह कर जेल में डाल दीजिये, गुप्तांगों में पत्थर भरवा दीजिये, और पत्थर भरने वाले को राष्ट्रपति से इनाम दिलवा दीजिये,
हराम की कमाई से खूब सारे पटाखे खरीदिये,
जो पटाखें ना जलाने की अपील करें उसे हिन्दु विरोधी कह कर गालियां बकिये,
फिर जब हवा में ज़हर घुल जाये , बच्चे सांस ना ले पा रहे हों ,
तो केजरीवाल को गालियां बकिये,
आप की दुर्गति के जिम्मेदार आप खुद हैं ,
हम तो कब से बोल रहे हैं और मार खा रहे हैं ,

आंख मूंद कर चलना अधर्म है

मेरे परदादा का नाम बिहारी लाल शर्मा था,
वो उत्तर प्रदेश में महर्षि दयानन्द के प्रथम शिष्य थे ,
महर्षि दयानन्द मुजफ्फर नगर मे हमारे घर मे ठहरते थे ,
उत्तर प्रदेश आर्य समाज भवन लखनऊ मे लगी संगमरमर की तख्ती पर हमारे परदादा का नाम सबसे ऊपर लिखा हुआ है,
हमारे घर पर नियमित हवन होता था ,
इस सब के बावजूद मैं कहता हूँ ,
कि हवन करने से वायु प्रदूषण कम नहीं होता ,
हवन करने से वातावरण शुद्ध नहीं होता ,
बल्कि आग मे कुछ भी जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है ,
मैं चाहता हूँ मैं सच्चाई और विज्ञान को जानूं ,
सच्चाई को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके बाप दादा क्या मानते थे ,
सत्य ही धर्म है ,
पुरानी लकीर पर आंख मूंद कर चलना अधर्म है ,

नंदिनी


नन्दिनी सुन्दर से मैं सन 2005 में पहली बार मिला था ,
नन्दिनी सुंदर दन्तेवाड़ा में हमारे आश्रम में आती रहती थीं,
मैं और मेरी पत्नी और हमारे आदिवासी साथी आश्रम बना कर काम कर रहे थे ,
सरकार ने सलवा जुडुम अभियान चलाया था ,
सरकार ने साढ़े छ्ह सौ गांव जला दिये थे ,
सैकड़ों आदिवासी महिलाओं से सरकारी फौजों ने बलात्कार किये थे ,
हज़ारों निर्दोष आदिवासी मार डाले गये थे ,
हज़ारों बेगुनाह आदिवासी स्त्री पुरुषों को जेलों में ठूंस दिया गया था,
नन्दिनी ने पहले बस्तर के आदिवासियों पर शोध करी थी ,
आदिवासियों पर इस सरकारी हमले के खिलाफ नन्दिनी ने आवाज़ उठाई ,
सुप्रीम कोर्ट में सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर किया ,
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के कदम को संविधान विरोधी बताया ,
सलवा जुडुम को बन्द करना पड़ा ,
अभी केस चल ही रहा था ,
पुलिस ने फिर से तीन गांवों को जला दिया ,
सुप्रीम कोर्ट ने जांच कराई ,
सीबीआई ने कहा आग पुलिस ने लगाई ,
उस समय वहां का पुलिस अधीक्षक कल्लूरी था ,
खुद को फंसता देख कल्लूरी ने चाल खेली ,
एक गांव में एक हत्या हुई ,
पुलिस नें उस मामले में नन्दिनी और उनके साथी कार्यकर्ताओं के नाम पर रिपोर्ट लिख कर मारे गये व्यक्ति की पत्नी का दस्तखत करवा लिया ,
कल्लूरी इस तरह के कामों में बहुत बदनाम है ,
कल्लूरी ने ही सोनी सोरी के चेहरे पर कैमिकल अटैक करवाया था ,
एक बार पहले भी पुलिस ने नन्दिनी को फंसाने की कोशिश करी थी ,
पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा ने पत्रकारों को बुला कर एक फोटो दिखाया था,
उस फोटो में नन्दिनी को नक्सली ड्रेस में नक्सली समूह के साथ दिखाया था,
नन्दिनी ने एसपी राहुल शर्मा को कानूनी चुनौती दी थी,
एसपी राहुल शर्मा ने नन्दिनी से लिखित माफी मांगी थी ,
एक बार पुलिस थाने में नन्दिनी का कैमरा छीन लिया गया था,
जो कई महीने बाद वापिस मिला था ,
पुलिस आवाज़ उठाने वालों पर कैसे हमला करती है यह आप समझ सकते हैं,
सोचिये बस्तर के आदिवासियों को यह पुलिस कैसे फर्जी मामलों में फंसाती होगी ?

मोदी हिन्दुओं का नेता

आप आज़ाद हैं इसलिए आप किसी को भी अपना नेता मान सकते हैं .
मोदी को भी मान सकते हैं .
लेकिन सोचिये अगर आपके साथ रहने वाले मुसलमान भी दो हज़ार हिंदुओं को मारने वाले किसी मुसलमान को जान बूझ कर अपना नेता चुन लें और उसे अपना शेर नेता ,और उसके भाषणों को शेर का गरजना और उसे वीर नेता कहने लगें तो आप के मन में मुसलमानों के बारे में कैसा भाव आयेगा ?
ईमानदारी की बात तो यही है कि हमने मोदी को मुसलमानों को सबक सिखाने की उसकी योग्यता के कारण ही अपना वीर नेता माना है .
हिंदुओं द्वारा मोदी को अपना नेता मान लेने से मुसलमानों के मन में हिंदुओं के प्रति डर और संदेह नहीं पैदा होगा क्या ?
भारत में पच्चीस करोड मुसलमान हैं . इन्हें ना तो आप भारत से भगा सकते हैं ना ही इन्हें डरा कर रख सकते हैं .
मोदी जैसे व्यक्ति को अपना नेता चुनना हिंदुओं के बारे में मुसलमानों के मन में दूरी ही पैदा कर रहा है .
भारत एक नया देश है . इसकी एकता और अखंडता इसके सभी समुदायों के मिल कर प्रेम से रहने पर ही निर्भर करेगी .
कोई एक समुदाय अगर दुसरे समुदायों को डरा कर रखने की कोशिश करेगा तो देश टूट भी सकता है .
इसे एक रखने की जिम्मेदारी तो सभी की है . ऐसा नहीं हो सकता कि आप तलवारें हाथ में लेकर नंगा नाच नाचें और मुसलमान इस देश को एक रखने के लिए आपसे पिटते ही रहें .
अभी भी वख्त है .

मूर्ख प्रजाति



एक बाबा का पूरे पेज का विज्ञापन अखबार में छ्पा है ,
उसमें कुछ लोगों के नाम से किन्हीं " ब्रह्म ऋषि कुमारस्वामी" के चमत्कारों का प्रचार किया गया है ,
इसमें बाबा के आशीर्वाद से परीक्षा में पास होने से लेकर कब्ज़ ठीक होने तक के चमत्कारों का दावा किया गया है ,
इन बाबा जी की प्रशंसा में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह और हिमाचल के महाभ्रष्ट मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह द्वारा कहे गये वक्तव्य छापे गये हैं ,
भारत का संविधान कहता है राज्य अपने नागरिकों में वैज्ञानिक समझ बढ़ाने के लिये काम करेगा ,
जादू टोने से बीमारियां ठीक करने का दावा करना कानूनी अपराध है ,
लेकिन अगर अपराधी की प्रशंसा भारत का प्रधानमंत्री ही करेगा ,
तो उस अपराधी को कौन रोक सकता है ?
हिन्दुओं तुम्हें धर्म की आड़ में महामूर्ख बनाया जा रहा है ,
इससे तुम्हारा या तुम्हारी सन्तानों का भला नहीं हो रहा ,
बल्कि तुम्हारी सन्तानों को बेवकूफ, नफरती और क्रूर बनाया जा रहा है ,
तुम्हारे दुश्मन मुसलमान, इसाई या कम्युनिस्ट नहीं है ,
तुम्हारे और तुम्हारी सन्तानों के असली दुश्मन ये धर्मगुरू और साम्प्रदायिक नेता हैं ,
आंखें खोलो ,
खुद को दुनिया की मूर्ख प्रजाति सिद्ध मत करो ,

युद्ध का विरोध

भाजपा का चुनाव जीतने का नोटबन्दी का यह हथकण्डा फेल होगा ,
चुनाव जीतने के लिये भाजपा के पास दो हथकण्डे बचेंगे ,
पाकिस्तान से युद्ध या हिन्दु मुस्लिम दंगा,
लेकिन जो लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को पसंद करने वाले लोग हैं ,
उनके लिये समाज को बचाने के लिये कुछ करने का सही समय है,
अगर समाज को तोड़ने वाली इस पार्टी का कोई विकल्प नहीं है ,
तो अब आप ही विकल्प बन जाइये ,
अपने शहर में दो मुद्दों पर जनमत बनाइये ,
युद्ध नहीं शान्ति,
सभी लोगों के बीच एकता ,
यह सन्देश बच्चों और युवाओं के द्वारा हवा में फैलाने का काम करना है ,
स्कूल कालेजों में इन दो विषयों पर निबन्ध लेखन और चित्र बनाने की प्रतियोगितायें आयोजित करिये,
पहले लोकतन्त्र और धर्मनिरपेक्ष लोगों और संगठनों की बैठक बुलाइये ,
सामने खड़ी चुनौती और अपनी रणनीति का प्रस्ताव रखिये ,
समय देने वाले , दौड़भाग करने वाले ,
गाड़ी, पर्चे छपाई , बैनर ,पुरस्कार की व्यवस्था करने वाले लोगों को सहमत कीजिये ,
बड़े स्कूल , कालेजों में युद्ध के क्या नुकसान होते हैं और एकता के क्या लाभ हैं , विषयों पर निबन्ध और पोस्टर बनाओ प्रतियोगिता करवाइये ,
हर स्कूल और कालेज में से 1O सबसे अच्छे निबंध और पोस्टर चुन लीजिये ,
शहर के मैदान में सभी प्रतिभागियों को बुलाइये ,
सभी धर्मनिरपेक्ष , प्रगतिशील , संस्था , संगठनों , राजनैतिक पार्टियों के लोगों को बुलाइये ,
बच्चों के बनाये पोस्टरों की प्रदर्शनी लगाइये ,
कुछ चुनिंदा निबंधों को मंच पर बच्चों से पढ़वाइये,
युद्ध का शैतानी अर्थशास्त्र समझाइये ,
युद्ध विरोधी नारे लगाइये,
साम्प्रदायिक राजनीति के षडयंत्र पर बोलने के लिये वक्ताओं से काहिये ,
धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में नारे लगाइये,
कला जत्था , या गीत गाने वाले साथियों से गीत व नाटक करवाइये,
संभव हो तो युद्ध विरोधी और सर्वधर्म समभाव समर्थक जलूस निकालिये,
इस सब की मीडिया कवरेज करवाइये,
सोशल मीडिया पर जम कर फोटो, वीडियो फैलाइये,
माहौल बदल दीजिये ,
इतने जोश से काम कीजिये की समाज को तोड़ने वाली ताकतें अकेली पड़ जायें ,
आप अगर चाहे तो इस तरह के कार्यक्रमों में बाहर से जाने पहचाने कार्यकर्ताओं को भी बुला सकते है,
मैं तो आने के लिये एक पैर पर तैयार हूँ ,
ये वख्त घर में बैठने का नहीं है ,

लुत्फ़ उठाइए

जिंदगी छोटी है
आप किसे मारना चाहते हैं ?
जिस से आप नफरत करते हैं या डरते हैं ,
नफरत का स्थान आपके भीतर आपके दिमाग में है ,
आप अपने भीतर से उस इंसान को बाहर करना चाहते हैं ,
इसलिये आप उसे मारकर खुद को उस डर और नफरत से मुक्ति चाहते हैं ,
लेकिन जब आप उसे मारते हैं तो आपको उसके लिये ,
बहुत अधिक नफरत अपने दिमाग में पैदा करनी पड़ती है ,
जिस नफरत और डर से आप छुटकारा चाहते थे अब वह आपके भीतर और भी बढ़ गया है ,
आप जिस से डरते हैं उसी से नफरत करते हैं ,
अगर आप चींटी से नहीं डरते तो आप उस से नफरत भी नहीं करते ,
लेकिन अगर आपको चींटी से डर लगता है तो आपको चींटियों से नफरत हो जायेगी,
और आप चींटी को देखते ही उसे मार देंगे
आपका शत्रु भी आपसे डरता है,
इसलिये आप पर हमला करता है ,
अगर आप अपने शत्रु के प्रति अपना डर निकाल दें तो आपकी नफरत भी समाप्त हो जायेगी ,
अक्सर डर गलतफहमियों पर आधारित होता है ,
गलतफहमियां आपसी सम्पर्क के अभाव से पैदा होती हैं ,
पाकिस्तान आपसे डरता है इसलिये आपसे नफरत करता है ,
आप पकिस्तान से डरते हैं इसलिये आप उस से नफरत करते हैं ,
इसलिये समस्या डर और नफरत है
यही आपके असली शत्रु हैं ,
इसलिये मारना तो इनको पड़ेगा,
आप यदि एक दूसरे देशों के लोगों को मारेंगे तो ,
डर और भी बढ़ेगा,
नफरत भी बढ़ेगी
फिर फिर आप और भी हत्याएं करना चाहेंगे
और आप हमेशा इस नफरत डर और हत्या के कीचड में फंसे रहेंगे,
इस में आपको एक दूसरे का एक दूसरे के लिये ,
प्यार
सहानुभूति
जिज्ञासा
कभी दिखाई नहीं देगी ,
देखिये दोनों देशों के बुज़ुर्ग एक दूसरे से
मिलना और बात करना चाहते हैं
देखिये दोनों देशों के बच्चे एक दूसरे के साथ खेलना चाहते हैं
देखिये दोनों देशों के नौजवान लड़के लड़कियां एक दूसरे के साथ दोस्ती और मुहब्बत करना चाहते हैं
दोस्ती को मौका दीजिए
मुहब्बत को मौका दीजिए
शांति को मौका दीजिए
सामने वाले से उम्मीद मत कीजिये
खुद शुरुआत कीजिये
जिंदगी छोटी है
बेकार के कामों में मत गंवाइए
इसका लुत्फ़ उठाइए
जिंदगी एक नियामत लगेगी

नोटबन्दी और आदिवासी

नोटबन्दी के द्वारा आदिवासियों की कमर तोड़ने की भाजपा की कोशिश ,
बस्तर में आदिवासियों की ज़मीनें हड़पने के लिये सरकार लगातार गांव पर हमले करती है ,
अब आदिवासियों को आर्थिक तौर पर कमज़ोर करने के लिये ,
भाजपा सरकार उनकी छोटी- मोटी जमा पूँजी छीनने हड़पने में लग गई है ,
आदिवासी महुआ , तेंदु पत्ता , मुर्गी, या बकरी बेच कर ,
या मज़दूरी का थोड़ा बहुत पैसा बचा कर अपने पास रखते हैं ,
आदिवासियों के बैंक खाते नहीं हैं ,
आदिवासियों के राशन कार्ड , वोटर कार्ड सरकार ने पहले ही जला दिये थे,
ऐसी हालत में आदिवासी किसी बैंक खाता वाले किसी परिचित या रिश्तेदार के खाते में मिलकर पैसा जमा कराने की कोशिश कर रहे हैं ,
पुलिस आकर आदिवासियों को पकड़ रही है ,
पुलिस कहती है कि यह पैसा तुम्हें नक्सलवादियों नें दिया है ,
बारसूर के निकट गांव की चार आदिवासी महिलाओं को मात्र साठ हजार रूपये की वजह से दो दिन तक थाने में अवैध हिरासत में रखा गया है,
पिछले चार दिनों में ग्यारह आदिवासियों की हत्या पुलिस ने कर दी है ,
आदिवासियों की हत्या के बाद पुलिस का आईजी कल्लूरी दावा करता है कि ये लोग नक्सली थे और अपना छिपा हुआ पैसा निकाल रहे थे,
अनेकों गांवों पर पिछले कुछ दिनों से लगातार हमला कर रही है ,
आदिवासी पुलिस की फायरिंग से बचने के लिये जंगल में भागते हैं ,
तो पुलिस कहती है कि देखो नक्सलवादी अपना छिपा हुआ पैसा निकाल रहे हैं ,
नोटबन्दी के माहौल का फायदा भाजपा आदिवासियों पर ताजा हमले कर के उठा रही है ,
ताकि आदिवासी समुदाय की आर्थिक तौर पर कमर तोड़ दी जाय ,
जिससे आदिवासी लम्बे समय तक सरकार से लड़ने की ताकत ना जुटा पायें ,
लेकिन ऐसा होने नहीं दिया जायेगा ,
हम सभी लोकतांत्रिक लोग आदिवासियों के संघर्ष में उनके साथ रहेंगे ,
और सरकार के मंसूबों को हमेशा की तरह इस बार भी विफल कर देंगे ,

ये रही हकीकत

धन शब्द धान से बना है
पहले जो किसान मेहनत करके ज़्यादा धान उगा लेता था उसे धनवान कहते थे।
बाद में मुद्रा अर्थात पैसे का अविष्कार हुआ।
पैसे को वस्तुओं या सेवा के बदले लिया दिया जाने लगा.
तब से माना जाने ;लगा कि पैसा वस्तुओं का प्रतिनिधि है।
वस्तुओं की कीमत पैसे से नापी जाती है।
जैसे पहले एक रूपये में दस किलो अनाज आता था।
अब डेढ़ सौ रूपये में दस किलो अनाज आता है।
तो अनाज की कीमत बढ़ गयी
या कहिये कि पैसे की कीमत गिर गयी
तो असल में पैसे की कीमत गिरने से
अनाज की कीमत बढ़ गयी
किसी चीज़ की कीमत तब घटती है जब उसकी मात्रा ज़्यादा बढ़ जाती है
जैसे पैसे की मात्रा ज़्यादा हो गयी
तो पैसे की कीमत घट गयी
परिणाम स्वरूप वस्तुओं का मोल बढ़ गया
इसे ही आप महंगाई कहते हैं
इसे अर्थशास्त्र में मुद्रा स्फीति कहा जाता हैं
अर्थात वस्तुओं और सेवाओं के मुकाबले मुद्रा का ज़्यादा हो जाना
मान लीजिए मेरे पास सौ करोड़ रूपये हैं
मैंने सुबह बैंक में फोन करके सौ करोड़ रुपयों के शेयर्स खरीद लिए
शाम को मैंने दस प्रतिशत बढे हुए रेट पर वो शेयर बेच दिए
शाम तक मेरे पास दस करोड़ रूपये का मुनाफा आ गया
इस मामले में मैंने ना तो किसी वस्तु का उत्पादन किया ना ही किसी सेवा का उत्पादन किया
लेकिन मेरे पास दस करोड़ रूपये बढ़ गए।
पैसे मेरे बैंक में ही हैं
अब मैं चेक से उन पैसों से अनाज भी खरीद सकता हूँ
मैं अनाज मंडी में खरीदे गए सारे अनाज को खरीद लेता हूँ
बाजार में बिक्री के लिए अनाज नहीं जाने देता
इससे अनाज की मांग बढ़ जाती है
इससे अनाज की कीमत बढ़ जाती है
अनाज की कीमत दस करोड़ एक दिन में कमाने वाले के लिए नुकसानदायक नहीं है
लेकिन सौ रुपया रोज़ कमाने वाले मजदूर के लिए नुकसानदायक होगी
अनाज उगाने वाले किसान को ज़्यादा पैसा मिलेगा
लेकिन चूंकि पैसे की कीमत तो गिर ही चुकी है
इसलिए उसे उस पैसे की बदले में कम सामान मिलेगा
तो पूंजी बैठे बैठे
पैसे को बढ़ाने की ताकत किसी के हाथ में दे देती है
उसका पैसा तेज़ी से बढ़ता जाता है
लेकिन मेहनत करने वाले मजदूर
या मेहनत से उत्पादन करने वाले किसान
का पैसा तेज़ी से नहीं बढ़ता
इसलिए यह तबका इस अर्थव्यवस्था में गरीब बन जाता है
शेयर खरीदने के लिए मुझे बैंक क़र्ज़ देता है
मैं चाहूँ कितनी ही कंपनियां बना सकता हूँ।
मैं चाहूँ तो अपनी ही कम्पनी के शेयर भी खरीद सकता हूँ।
बैंक में किसान और मजदूर का भी पैसा जमा है।
किसान और मजदूर के बैंक में जमा पैसे से मैं अपनी ही कंपनी के शेयर खरीदता हूँ
खुद ही उनके रेट बढाता हूँ
खुद ही मुनाफ़ा कमाता हूँ
और मेरे पास पैसा बढ़ता जाता है
उधर किसान का अनाज नहीं बढ़ रहा
इसलिए उसके पास पैसा भी नहीं बढ़ेगा
मैं इस पैसे से नेता अफसर और पुलिस को खरीद लूँगा
मैं इस पैसे से अपना कारखाना लगाने के लिए किसान की ज़मीन पुलिस के दम पर छीन लूँगा
अब मेरे पास बिना काम किये रोज़ करोड़ों रूपये आते जायेंगे
अब सरकार पुलिस और जेल अदालत मेरे बिना मेहनत से कमाए हुए धन की सुरक्षा करेगी
जो गरीब इस तरह से मेरे धन कमाने को गलत मानेगा
उसे सरकार जेल में डाल देगी
अब नौजवानों को रोज़गार मेरे ही कारखाने या दफ्तर में मिलेगा
अब कालेज में नौजवानों को वही पढ़ाया जाएगा जिसकी मुझे ज़रूरत होगी
अब नौजवान मेरी सेवा करने के लिए पढेंगे
अब बच्चों की शिक्षा मेरे कहे अनुसार चलेगी
मैं टीवी के चैनल भी खरीद लूँगा
अब टीवी आपको मेरा सामान खरीदने के लिए प्रेरित करेंगे
मैं शापिंग मॉल भी खरीद लूँगा
मैं छोटी दुकाने बंद करवा दूंगा
अब आप मेरे ही कारखाने या दफ्तर में काम करेंगे
और मेरे ही शापिंग मॉल में जाकर खरीदारी करेंगे
मैं ही एक हाथ से आपको पैसे दूंगा
और दूसरे हाथ से पैसे ले लूँगा
आप दिन भर मेरे लिए काम करेंगे
अब आप मेरे गुलाम हो जायेंगे
अब मैं आपकी जिंदगी का मालिक बन जाऊँगा
अब मैं करोड़ों लोगों की जिंदगी का मालिक बन जाऊँगा
अब आपको वहाँ रहना पड़ेगा जहां मेरा आफिस या कारखाना है
आपके रहने की जगह मैं निर्धारित करूँगा
आपको मैं उतनी ही तनख्वाह दूंगा जिसमे आपका परिवार जी सके
आप अपनी बेसहारा बुआ मौसी या माता पिता को अपने साथ नहीं रख पायेंगे
तो आपके परिवार का साइज़ भी मैं तय करूँगा
अब आप मेरे लिए काम करते हैं
आपके बच्चे मेरे लिए पढते हैं
आप मेरी पसंद की जगह पर रहते हैं
अब मैं जिस पार्टी को चाहे टीवी की मदद से आपके सामने
महान पार्टी के रूप में पेश कर देता हूँ
आप उसे वोट भी दे देते हैं
मैं साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल करके आपको मेरे लिए फायदे मंद पार्टी को वोट देने के लिए मजबूर करता हूँ
मैं अफ्रीका में अलग अलग कबीलों को आपस में लड़वाता हूँ
मैं भारत में अलग अलग संप्रदायों को लड़वाता हूँ
और फिर बड़े कबीले की तरफ मिल कर सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता हूँ
भारत में अभी बड़ा कबीला हिंदू है
इसलिए मैं हिंदुओं की साम्प्रदायिकता को भड़का कर अपने गुलाम नेता को सत्ता में बैठा देता हूँ
पाकिस्तान में मैं मुसलमान साम्प्रदायिकता को भडकाता हूँ
क्योंकि पाकिस्तान में बड़ा कबीला मुसलमान हैं
ये रही हकीकत आपकी
राजनीति
साम्प्रदायिकता
अर्थव्यवस्था
शिक्षा व्यवस्था
और विकास की

भक्त

मैं धर्मनिरपेक्ष हूँ
भक्त - तू सिकुलर है, जा पाकिस्तान,
मैं समता के पक्ष में हूँ
भक्त- तू कम्युनिस्ट है, रूस और बंगाल में क्या कर लिया तुम लोगों ने ? जाओ चीन जाओ ,
मैं न्याय के पक्ष में हूँ ,
भक्त- मतलब तू नक्सलवादी है ? तुम आतंकवादी हो , तुम्हें मारने के लिये तो आर्मी को भेज देना चाहिये ,
मैं बंधुता के पक्ष में हूं ,
भक्त - मतलब हम इसाइयों और मुल्लों को गले लगा लें ? वामियों सुधर जाओ ,
लेकिन मैं जिन बातों का पक्षधर हूँ वह सब तो संविधान की प्रस्तावना में लिखा हुआ है ?
भक्त - ओह संविधान ? यानी तू अम्बेडकरवादी है ? अबे तुम लोगों के आरक्षण की वजह से आज हमारी ये हालत है ၊
तो यह है आम भाजपा समर्थक की समझ ၊
आइये एक बार फिर से ध्यान से पढ़ें संविधान का पहला पन्ना :
हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न
समाजवादी
पंथनिरपेक्ष
लोकतंत्रात्मक गणराज्य
बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,
विचार,
अभिव्यक्ति,
विश्वास
धर्म और उपासना
की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की
समता
प्राप्त कराने के लिए
तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और
राष्ट्र की एकता और अखंडता
सुनिश्चित करने वाली बंधुता
बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हज़ार छह विक्रमी) को एतद्‌द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

अंबेडकर


अंबेडकर साहब अगर आज होते तो वह क्या कर रहे होते ?
कुछ संभावित जवाब यह हो सकते हैं ,
अंबेडकर साहब आज होते तो दलितों पर होने वाले हमलों के खिलाफ आन्दोलन कर रहे होते ,
इसके साथ साथ अंबेडकर साहब वकील भी थे ,
तो अम्बेडकर साहब अदालतों में दलितों पर होने वाले हमलों के मुकदमे लड़ रहे होते ,
और दलितों की बस्तियां जलने वालों को ,
और दलितों के सामूहिक हत्याकांड करने वाले लोगों को अदालतें ठीक वैसे ही बरी कर रही होतीं ,
जैसे अदालतों नें लक्ष्मनपुर बाथे, बथानी टोला और हाशिमपुरा के आरोपियों को बरी कर दिया है ,
ऐसे में अंबेडकर साहब अपने बनाये हुए संविधान, अदालतों और चुनावों का महिमा गान कर रहे होते ,
या पीड़ित लोगों के साथ मिल कर पूरे ढाँचे को बदलने की बातचीत का हिस्सा बने होते ?
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अंबेडकर साहब ने कहा था कि अगर हमने जल्द ही आर्थिक और राजनैतिक न्याय को भारत के करोड़ों लोगों के लिए हकीकत नहीं बनाया ,
तो लोग इस संविधान को जला देंगे ,
बाबा साहब एक क्रन्तिकारी थे ,
उन्होंने मन्दिर प्रवेश का कार्यक्रम नहीं किया ,
उन्होंने महाड़ के तालाब के पानी पर सबके अधिकार का आन्दोलन किया ,
अंबेडकर साहब को इस अन्यायी और पूंजीवादी व्यवस्था के रक्षक के रूप में खड़ा करने का काम भारत के परम्परागत शासक वर्ग ने किया ,
जिसमें पूंजीपति, बड़े भू मालिक सवर्ण सम्पत्तिवान सत्ताधारी वर्ग शामिल थे ,
संविधान को इस व्यवस्था के प्रतीक के रूप में दिखाया गया ,
और अंबेडकर साहब को सीने से संविधान चिपकाए हुए पुतले लगा दिए गए ,
अंबेडकर साहब के पुतले कब दिखाई पड़ने शुरू हुए ?
1971 के बाद अंबेडकर साहब के पुतले दिखाए देने शुरू हुए ,
असल में यह नक्सली आन्दोलन के जवाब में हुई कार्यवाही थी,
1967 में नक्सली आन्दोलन को कांग्रेस नें बुरी तरह कुचला था ,
नक्सली आन्दोलन में एक समय में दलितों की भागीदारी का प्रतिशत 80% था ,
यह दलितों के लम्बे समय की उपेक्षा और अत्याचारों का परिणाम था ,
आज़ाद भारत में गोडसे के बाद पहली फांसी दो दलित किसानों को हुई थी ,
इन किसानों पर आरोप था कि उन्होंने ज़मींदार को मार डाला था ,
दलितों और आदिवासियों के एक हो जाने से मौजूदा व्यवस्था को बदलने के लिए वैकल्पिक राजनैतिक आन्दोलन के बहुत मज़बूत हो जाने का खतरा खड़ा हो गया था ,
दलितों को व्यवस्था विरोध के आन्दोलन से अलग करने के लिए अंबेडकर साहब को व्यवस्था के समर्थक के रूप में पेश किया गया ,
आज भी बहुत सारे दलित चिन्तक मानते हैं की दलित युवाओं का एकमात्र लक्ष्य सरकारी नौकरी पा लेना है ,
जबकि अंबेडकर साहब को सबसे ज्यादा निराशा इसी पढ़े लिखे वर्ग से थी ,
जो नौकरी पाने के बाद अपने समुदाय को भूल जाते हैं और अन्याय करने वाली व्यवस्था के सेवक बन जाते हैं ,
अंबेडकर साहब को और ज्यादा पढ़े जाने और समझे जाने की ज़रुरत है ,

मुख्य सचिव को सम्मन


बस्तर के आईजी कल्लूरी और
छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को सम्मन मिला ,
दोनों भाग खड़े हुए ,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ऐसी की तैसी ,
पहले पुलिस ने आदिवासियों के गांव जलाये ,
लड़कियों के साथ बलात्कार किये,
आदिवासियों का कत्ल किये ,
मैने मामला बाहर निकाला ,
लिंगा कोड़ोपी ने वीडियो बनाये ,
सीबीआई की टीम जांच करने गई तो पुलिस ने सीबीआई पर हमला किया,
नन्दिनी सुन्दर ने मामला कोर्ट मे उठाया,
सोनी सोरी ने मैदानी लड़ाई लड़ी ,
सरकार ने लिंगा कोड़ोपी को जेल में डाला ,
सोनी के मूंह पर तेज़ाब डाला ,
नन्दिनी सुन्दरी के ऊपर कत्ल का केस बना दिया ,
पुलिस और सरकार की बदमाशी देख कर ,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पुलिस आईजी कल्लूरी और छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव को समन भेज कर बुलाया,
लेकिन दोनों भाग खड़े हुए ,
आईजी कल्लूरी बीमारी का बहाना बना कर विशाखापटनम के फाइव स्टार प्राइवेट हस्पताल में भर्ती हो गये ,
मुख्य सचिव अमेरिका चले गये ,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अब मूंह देख रहा है ,
ये लोग हमें देशद्रोही कहते हैं ,
और खुद कानून और संविधान को जूते की नोक पर रखते हैं ,
राष्ट्रवाद सिर्फ अपने काले कारनामों को छिपाने का पर्दा है इन लोगों के लिये ,
लेकिन हम छोड़ेगे नहीं ,
संविधान के तले तो तुम्हें आना ही पड़ेगा ,

भविष्य के निर्माता


बस अड्डे से फोन पर अपनी बेटी से मैंने पूछा कि कहाँ हो अभी ?
बेटी की आवाज़ में कुछ नया उत्साह था,
बोली, पापा अभी मैं खेल कर घर आ रही थी तो रास्ते में खड्ड में एक छोटा सा पिल्ला पानी में गिरा हुआ था,
मैं उसे घर ले आयी हूँ, वो ठण्ड से काँप रहा है,
घर पहुँचने से पहले ही मैंने कल्पना कर ली थी कि मेरी बेटी उस पिल्ले को आज अपनी रजाई के अंदर सुलाने की जिद करेगी,
और मैं उसके इजाज़त मांगने से पहले उसकी इस मांग को पूरा करने का निर्णय ले चुका था,
घर आया तो मेरी बेटी ने अपना तौलिया उस पिल्ले को लपेटा हुआ था और वह जनाब सोफे पर बैठ कर दूध नोश फरमा रहे थे,
मैंने हीटर निकाला और उसके पास चालू कर दिया, पिल्ले ने थोड़ी देर में कांपना बंद कर दिया,
बच्चों की इस तरह की आदतें मेरे इस विश्वास को पक्का करती हैं कि इंसान मूल रूप में अच्छा ही होता है,
हमारी तथाकथित सभ्यता और संस्कृति इंसान को खराब बनाते हैं,
बच्चे जिस तरह कुत्ते, बिल्लियों, और चिड़ियों के साथ प्यार से पेश आते हैं वह मेरे इस दावे का सबसे साफ़ सबूत है ,
एक दूसरा वाकया,
कल एक नौजवान का फोन आया,
वह स्कूल में पढाता है,
नाटक भी लिखता है,
उसने बस्तर के आदिवासियों पर एक नाटक लिखा,
उस नौजवान के नाटक को पुरस्कार मिला,
पुरस्कार देने वाली संस्था का नाम है टाटा फाउंडेशन,
इनाम लेते समय उस नौजवान नें कहा की मैं आपको इस पुरस्कार के लिए कोई धन्यवाद नहीं दूंगा,
क्योंकि आप के ही बिजनेस संस्थान आदिवासियों की ज़मीनें छीन रहे हैं,
कल मुझे फोन पर उस नौजवान नें कहा कि सर मैं इनाम में मिले डेढ़ लाख का एक भी पैसा अपने लिए इस्तेमाल नहीं करूंगा,
आप ऐसे आदिवासियों के मामले मुझे बताइये जिनका इलाज बिना पैसे के ना हो पा रहा हो,
हांलाकि वह नौजवान चाहता तो इस पैसे से मोटर साईकिल या कोई कैमरा खरीद सकता था,
लेकिन उसने इसे बीमार आदिवासियों को देने का फैसला किया,
इंसानियत में हमारा विश्वास ऐसे नौजवान और बच्चे पक्का कर देते हैं,
साम्प्रदायिकता, जातिवाद और गरीबों की लूट ही हमारा भविष्य नहीं है,
भविष्य के निर्माता ये उम्मीदों से भरे करोड़ों बच्चे और नौजवान भी हैं,
इंसानियत में उम्मीद मत हारिये,

हमारा धर्म क्या है ?

हमारा धर्म क्या है ?
सारे इंसानी समाज का धर्म यह है की दुनिया को तकलीफ से मुक्त बनाया जाय ,
दुःख से मुक्त यानी ?
कोई भूखा न रहे , कोई बिना इलाज न मरे , किसी को बेईज्ज़त ना किया जाय , किसी के साथ शारीरिक हिंसा ना हो , सभी इंसानों की इज्ज़त , अधिकार और अवसर बराबर हों ,
क्या ऐसा मानना कम्युनिस्ट विचारधारा है ?
नहीं बिलकुल नहीं ? सभी धर्म बराबरी की बात कहते हैं ?
सभी धर्म दुःख से मुक्ति की बात कहते हैं .
लेकिन ऐसी कोशिश तो रूस चीन और दुसरे कम्युनिस्ट देशों में फेल हो चुकी है .
तो क्या हुआ ?
अगर एक बार कोई प्रयोग फेल हुआ तो इसका मतलब यह तो नहीं है कि दुनिया में अब कभी भी इंसानी समाज को दुखों से मुक्त करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए ,
ठीक है तो इस तरह की दुनिया बनाने में बाधा क्या है ?
आँखें खोल कर अपने आस पास देखिये इंसानी समाज को दुःखी रखने वाली चीज़ें दिखाई देनी शुरू हो जायेंगी ,
बल्कि बाहर भी मत देखिये ,
अपने भीतर देखिये संसार को दुखी बनाने वाली आपको अपने भीतर मिल जायेंगी
आप मानते हैं कि कुछ लोग जन्म से छोटी ज़ात के होते हैं और कुछ लोग ऊंची ज़ात के होते हैं ,
आप मानते हैं कि आपके धर्म के अलावा दुसरे धर्म वाले वहशी और बेवकूफ होते हैं ,
आप मानते हैं कि आपका देश सबसे अच्छा है और पड़ोसी राष्ट्र सबसे खराब है ,
आप मानते हैं कि मेहनत करने वालों का गरीब रहना ठीक है ,
और आपका सिर्फ कम्प्यूटर चला कर या फोन पर आफिस के कुछ फोन करके लाखों रुपया कमा लेना न्यायोचित है ,
आप ऐसा क्यों सोचते हैं ?
असल में आप हमेशा खुद को ठीक मानते हैं ,
जैसे अगर आप हिन्दू हैं तो आप मुसलमानों को गलत मानते हैं ,
आप अगर सवर्ण हैं तो आप मानते हैं की दलितों नें आरक्षण के बल पर सवर्णों के अधिकार छीन लिए हैं ,
अगर आप भारतीय हैं तो आप पकिस्तान को गलत और उसे अपने देश का दुश्मन मानते हैं ,
लेकिन सच किसी ख़ास परिस्थिति में होने के कारण बदलता नहीं हैं ,
सच को अपनी परिस्थिति से हट कर तभी समझा जा सकता है जब आप को वैज्ञानिक ढंग से किसी मुद्दे का परिक्षण करना आता हो ,
जैसे समाज शास्त्र की पुस्तक होती है ,
वह जाति व्यवस्था के बारे में वैज्ञानिक ढंग से बतायेगी,
क्या आप भी उसी तरह से जाति व्यवस्था के बारे में अपने सवर्ण पूर्वग्रहों से आज़ाद होकर सोच सकते हैं ?
इसी तरह साम्प्रदायिकता और राष्ट्रवाद के बारे में वैज्ञानिक ढंग से सोचने की आदत डालनी पड़ेगी ,
यही तरीका है दुनिया को तकलीफों से मुक्त करने का ,
लेकिन दुनिया के ज़्यादातर लोग गलत ढंग से सोचने की आदत डाल चुके हैं,
वो खुद की परिस्थिति के मुताबिक दुनिया को मानते हैं ,
वो अपने अलावा दूसरों से नफरत करते हैं ,झगड़े करते हैं युद्ध करते हैं , हथियार बनाते हैं ,
आपके राजनेता आपकी गलत तरीके से सोचने की कमजोरी का फायदा उठाते हैं
वो आपको युद्ध के लिए भड़काते हैं , आपमें नकली राष्ट्रभक्ति पैदा करने के भाषण देते हैं ,
ज्यादातर जगहों पर बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़का कर सत्ता पर कब्ज़ा किया जाता है ,
ऐसा भारत में भी होता है , पकिस्तान में भी होता है , अफ्रीका में भी होता है , और अमेरिका में भी इस बार यही खेल खेला गया है ,
क्या इस सब को समझना इतना कठिन है ?
थोड़ी देर के लिए अपने आप को अपनी परिस्थिति वाली सोच से आज़ाद कर के सोचिये ,
जैसे आप मुसलमान हैं तो थोड़ी देर हिन्दू की जगह खड़े होकर सोचिये ,
भारतीय हैं तो खुद को पाकिस्तानी मान कर सोचिये ,
अमीर हैं तो खुद को मजदूर की जगह रख कर सोचिये ,
आप को सच का थोडा प्रकाश मिलने लगेगा ,
आप जिन लोगों को मानवाधिकार कार्यकर्ता कह कर गालियाँ देते हैं वे लोग बस यही तो करते हैं ,
वे खुद को आदिवासी की या दलित की या अल्पसंख्यक की जगह रख कर सोचते हैं ,
लेकिन चूंकि मानवाधिकार कार्यकर्ता आपके समूह के स्वार्थ से अलग न्याय की बात करते हैं
तो आप कहते हैं कि ये मानवाधिकार कार्यकर्ता विदेशी एजेंट हैं और देशद्रोही हैं या कम्युनिस्ट हैं ,
असली बात यह है कि आपको खुशी देने वाली बातें कर के जो लोग आपको दुसरे धर्म वालों से या पड़ोसी देश के खिलाफ बातें कर के सत्ता प्राप्त कर रहे हैं ,
वे लोग आपके बच्चों के लिए एक खतरनाक दुनिया बना रहे हैं ,
एक ऐसी दुनिया जो हथियारों से भरी हो ,
जिसमें लोग एक दुसरे से नफरत करते हों ,
जहां अमीर अपने मुनाफे के लिए हवा समुन्दर और पानी में ज़हर घोलने के लिए आज़ाद हों ,
क्या आप अपने बच्चों को ऐसी दुनिया देकर मरना चाहते हैं ?
हम आपसे कम्युनिस्ट बन जाने के लिए नहीं कह रहे ,
हम चाहते हैं आप खुद सोचें कि इस दुनिया की समस्या क्या है ?
और उनका इलाज क्या है ?

सोनी सोरी को मैरी पाटिल पुरस्कार

रविवार को मुम्बई में सोनी सोरी को मैरी पाटिल पुरस्कार से सम्मानित किया गया ,
मैरी पाटिल ने आदिवासियों की शिक्षा के लिये अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे ,
पुरस्कार स्वरूप पच्चीस हजार की सम्मान राशि और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया,
कार्यक्रम की अध्यक्षता मैगसेसे पुरस्कार विजेता , दलित अधिकार कार्यकर्ता बैजवाड़ा विल्सन ने करी,
सोनी सोरी को दिये गये प्रशस्ति पत्र का पाठ यह है ,
सोनी सोरी जी,
सादर अभिवादन!
आपका जन्म समेली गाँव, जिला दन्तेवाड़ा, छत्तीसगढ़ में हुआ।
आपका परिवार राजनीतिक चेतना से संपन्न परिवार है।
आपके पिता गाँव के सरपंच और चाचा सीपीआई पार्टी के विधायक रहे हैं।
आपकी पढ़ाई गांधीवादी परिवेश में हुई।
पढ़ाई पूरी करने के बाद आप आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने में जुट गईं लेकिन उसी समय आदिवासियों की ज़मीनें बड़ी कम्पनियों को देने के लिए सरकार ने सलवा जुडुम नामक अभियान चलाया।
इस अभियान में आदिवासियों के गाँव खाली कराने के लिए घरों को आग लगाई गईं, आदिवासी महिलाओं से सुरक्षा बलों ने निर्मम अत्याचार किए और हज़ारों निर्दोष आदिवासियों को जेलों में ठूंसा।
आपने आदिवासियों पर हुए सरकारी अत्याचारों का विरोध किया।
फलस्वरूप पुलिस ने आपके पति अनिल पर फर्जी मामले बनाकर कारागार में डाल दिया, बाद में कोर्ट ने अनिल को निर्दोष माना लेकिन रिहाई के दिन पुलिस ने अनिल को इतना मारा कि वो कोमा में चले गए और कुछ दिनों में उनका देहान्त हो गया।
पुलिस ने आपको और आपके पत्रकार भतीजे लिंगा कोड़ोपी पर भी फर्जी मुकदमे दायर किए।
आप पर पुलिस थाने में झूठे कागजों पर दस्तखत करने के लिए दबाव डाला गया और अरूंधति रॉय और हिमांशु कुमार जैसे बुद्धिजीवियों को नक्सली बताने को कहा गया लेकिन आप पुलिस के दबाव के सामने नहीं झुकी।
आपको ढाई साल जेल में रखा गया।
सर्वोच्च न्यायालय से ज़मानत पर रिहा होने के बाद आपने आदिवासियों के मानवाधिकारों के लिए काम करना जारी रखा।
आपने आदिवासी बाड़ियों में घूम घूमकर ऐसे आदिवासी बच्चों को खोज निकाला, जिनके मातापिता पुलिस या नक्सलवादियों द्वारा मार दिए गए थे।
ऐसे बच्चों को आपने अपने स्कूल में पनाह दी।
सरकार ऐसे बच्चों के खाने, कपड़े के लिए पैसा नहीं देती थी, आपने अपने वेतन के पैसों से उन बच्चों की शिक्षा जारी रखी।
आपको सामाजिक साहस हेतु दिल्ली हिन्दी अकादमी का संतोष कोली तथा समाज सेवा हेतु कुंती माथुर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
हम आपकी संघर्षमय जीवनयात्रा तथा सेवामयी वृत्ति से अभिभूत हैं।
आप अटूट संघर्ष की एक अनोखी मिसाल हैं। आपके कारण आदिवासी बच्चों के जीवन में ज्ञान का आलोक फैला हुआ है और आपके ही कारण उनका भविष्य उज्ज्वल मार्ग पर अग्रसर हो रहा हैं।
आपके इस गरिमामयी कार्य के लिए इस वर्ष का दूसरा मेरी पाटील स्मृति पुरस्कार प्रदान करते हुए हमें अपूर्व हर्ष और गर्व की अनुभूति हो रही हैं।

असली देशभक्त

सुप्रीम कोर्ट मेरी गिरफ्तारी का आदेश दे,
मैं सिनेमा हाल में राष्ट्रगान में खड़ा नहीं होऊंगा,
मैं अपनी देशभक्ति का तरीका खुद तय करूंगा,
इस देश में हजारों आदिवासी मारे जाते हैं,
जो लोग कोई आवाज़ नहीं उठाते,
वो लोग राष्ट्रगान में खड़े होकर राष्ट्रभक्त बन जायेंगे ?
दलितों का सामूहिक जनसंहार होता है,
अदालतें आरोपियों को बरी कर देती हैं,
दलितों की मौतों पर ज़रा भी चिंतित ना होने वाले लोग सिनेमा हाल में 52 सेकेण्ड खड़े होकर देशभक्त बन जायेंगे ?
मैं नकली देशभक्ति के इस शार्टकट का बहिष्कार करता हूँ,
देशप्रेम असली वाला चाहिए,
ऐसा देशप्रेम जो अपने देशवासियों के लिए हो,
देशप्रेम वह जो अपने देश की हवा पानी नदियों समुन्द्रों की रक्षा के लिए हो,
यह नहीं कि अम्बानी अदानी जब देश की हवा पानी नदी समुन्द्र को ज़हरीला बनाएं तो आप उनके तलवे चाटें,
और जाकर सिनेमा हाल में देशप्रेमी बन जाएँ,
मैं उस गोत्र का हूँ जिस गोत्र के लोग इस देश के जंगलों, पहाड़ों, सागर तटों, को बचाने के लिए लाठियां खा रहे हैं, जेल जा रहे हैं, गोली खा रहे हैं और जिनके गुप्तांगों में थाने के भीतर पत्थर भरे जा रहे हैं,
सुप्रीम कोर्ट को शायद आदिवासी महिलाओं के गुप्तांगों में पत्थर भरने वाले देशद्रोही ना लगते हों,
हमें लगते हैं,
हम इस देश की मेहनतकश जनता, मेहनतकश जातियों, औरतों अल्पसंख्यकों को देश मानते हैं,
हम इन सब से बेइन्तहा प्रेम करते हैं,
जो लोग आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के मरने पर भी डेढ़ हज़ार का पीज़ा और पॉप कार्न चबाते हुए मूंह बिचका देते हैं,
उन्हें दिखावे के आरामतलब राष्ट्रप्रेम के लिए सिनेमा हाल में खड़े होने की ज़रुरत होगी,
हमरे लिये राष्ट्र, सिनेमा के अंदर नहीं उसके बाहर है,
समझे सुप्रीम कोर्ट के जज साहब ?
सुप्रीम कोर्ट को गुंडे अमित शाह की ताली बजाने वाली संस्था मत बनाओ,
हम जैसे असली देशभक्त ज़िन्दा हैं अभी,

पुलिस भी इन गुण्डों का साथ देगी

पूरे देश में संघ के गुण्डो का राज कायम करने की कोशिश करी जा रही है ,
संघी गुण्डे आपको सिनेमा हाल में पीट सकते हैं,
आपकी बेटी , आपकी बीबी की बेइज्ज़ती कर सकते हैं ,
यह अधिकार तो उनको सुप्रीम कोर्ट ने दे ही दिया है ,
गुण्डों को यह कहने से कौन रोक लेगा कि आपकी बेटी या आपकी पत्नी राष्ट्रगान में बैठी हुई थीं ,
इसलिये उन्होंनें उनके कपड़े फाड़ दिये ,
पुलिस भी इन गुण्डों का साथ देगी ,
क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश है ,
हमने यह सब खूब देखा है ,
छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम में यही सब किया था ,
इसी भाजपा सरकार नें ,
राष्ट्र रक्षा के नाम पर हजारों लड़कियों से महीनों बलात्कार किये गये ,
अब यह प्रयोग देश भर में फैलाया जा रहा है ,
दो महीना पहले हरियाणा में दो मुस्लिम लड़कियों से गोरक्षकों ने घर में घुस कर यह कह कर बलात्कार किया था कि तुम लोग गाय खाते हो इसलिये हम तुम्हें यह सज़ा दे रहे हैं ,
इन गुण्डों की देशभक्ति की ठेकेदारी सिनेमा हाल तक ही सीमित नहीं रहने वाली ,
घर में घुस कर जैसे अखलाक की हत्या करी वैसे ये आपके घर में भी घुसेंगे ,
जैसे अखलाक के हत्यारे को तिरंगे झण्डे में लपेटा गया ,
वैसे ही छत्तीसगढ़ में बलात्कारियों को राष्ट्रपति पुरस्कार दिये गये ,
आज़ादी के दीवानों के सबसे भयानक
डर अब हकीक़त की शक्ल ले रहे हैं ,

न्यायालय की अवमानना


बचपन में जब से होश संभाला स्वतन्त्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस का कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं गया जिसमें मेरा देश प्रेम पर भाषण या गीत ना होता हो ,
स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों का परिवार था,
पढ़ाई पूरी कर के देश सेवा का फैसला लिया ,
शादी के एक महीना बाद पत्नी के साथ बस्तर के जंगल में एक पेड़ के नीचे झोंपड़ी बना कर रहना शुरू किया,
तब वहां के आदिवासी देश का नाम या प्रधानमंत्री का नाम नहीं जानते थे,
मैं और मेरी पत्नी घर घर जाकर बीमारों को दवाईयां बांटते थे, पढ़ाते थे ,
उन गांवों में पहली बार तिरंगा हमने फहराया,
अट्ठारह साल देश सेवा के बाद ,
आदिवासियों पर सरकारी ज़ुल्मों के खिलाफ और संविधान के पक्ष में जब हम खड़े हुए,
तो भाजपा सरकार ने हमारे आश्रम पर बुलडोज़र चला दिया, हमारे साथियों को जेल में डाल दिया और हमारी हत्या की कोशिश की ,
आज वही भाजपा मुझे देशभक्ति सिखायेगी ?
मैने और मेरी पत्नी ने हज़ारों किलोमीटर की पदयात्रायें इस देश के गाँवों में करी हैं ,
पांव के छालों से खून बहने पर हम भगत सिंह पर जेल में पड़ने वाले कोड़ों की तकलीफ याद करते, और लहुलुहान पावों से चलते रहते थे ,
आज भी राष्ट्रगान सुन कर जोश से मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं ,
क्योंकि राष्ट्रगान मुझे लाखों शहीदों के बलिदानों से मिली ताकत देता है,
लेकिन ये संघी गुण्डे मेरे देशप्रेम के परिक्षक बनेंगे तो मैं पूरी ताकत से इनसे लडूंगा,
और रिटायरमेन्ट के बाद भाजपा सरकार से पद का लालची सुप्रीम कोर्ट का कोई जज अगर संधी गुण्डों को हमारे देशप्रेम का फैसला करने का अधिकार देगा ,
तो मैं उस जज के फैसले की अवमानना करूँगा ,

क्या भारत की समस्या देशद्रोह है ?

क्या भारत की समस्या देशद्रोह है ?
कौन है देशद्रोही ?
क्या कम्युनिस्ट देशद्रोही हैं ?
क्योंकि वो गरीब को न्याय दिलाने के लिए कोशिश कर रहे हैं ?
क्या गांधी थे देशद्रोही ?
क्योंकि वो कहते थे कि ईश्वर एक ही है ,
और हिन्दू मुसलमान दोनों उसकी संतानें हैं ?
क्या आंबेडकर देशद्रोही थे
क्योंकि उन्होंने आरक्षण की व्यवस्था संविधान में बनाई ?
क्या अख़लाक़ देशद्रोही था ?
जो अपने घर में बीबी बच्चों के साथ बैठा हुआ था ,
और जिसे अफवाह फैला कर हिन्दू आतंकवादियों नें मार डाला ?
कौन तय करेगा कि कौन देशद्रोही है ?
गांधी को गोली से उड़ाने वाला गोडसे तय करेगा कि गांधी को क्या मानना चाहिए ,
और अगर गांधी नहीं मानेंगे तो उन्हें मैं राष्ट्र के नाम पर गोली मार दूंगा ,
गोडसे को आदर्श मानने वाले आज देशभक्ति की शर्तें तय करेंगे क्या ?
गोडसे को आदर्श मानने वाले बताएँगे कि हम गांधी को मानने वाले या समानता के किसी विचार को मानने वाले देशभक्ति का सर्टिफिकेट लेने के लिए क्या करें ?
वे कहेंगे कि तुम सब मुसलमान और कम्युनिस्ट और अम्बेडकर को मानने वाले और आदिवासी हो,
इसलिए तुम सब तो जन्मजात देशद्रोही हो,
हम हिन्दू ब्राह्मण ठाकुर बनिया कायस्थ हैं और हम संघी हैं इसलिए हम राष्ट्रभक्त हैं,
तो तुमको हमसे राष्ट्रभक्ति का सर्टिफिकेट लेना पड़ेगा ,
सर्टिफिकेट तब मिलेगा जब तुम हमारे हिसाब से चलोगे ,
तो चलो सब सिनेमा हाल में खड़े हो जाओ ,
चलो सब मोदी को अपना नेता मानो ,
चलो जब हम कहें तब सब वन्दे मातरम गाना चालू कर दो ,
चलो सावरकर को वीर मानो,
चलो मनुस्मृति को महान मानो,
चलो पकिस्तान को गाली बको,
चलो अम्बानी को महान देशभक्त मानो,
तो जनाब हमें आपसे देशभक्ति का सर्टिफिकेट नहीं लेना,
हम देशभक्त हैं या नहीं ये हम खुद तय करेंगे,
हमरी देशभक्ति की शर्तें तय करने का काम नफरती हत्यारे और उनके गुलाम जज नहीं करेंगे,
समझ में आया या नहीं ?
बुरा लगा ?
चलो गोली मार दो या जेल में डाल दो ,
सच तो हम कहेंगे ज़रूर .

गोडसे को लगा कि गांधी राष्ट्रभक्त नहीं है

गोडसे को लगा कि गांधी राष्ट्रभक्त नहीं है ,
गोडसे को यह भी लगा कि मैं ज्यादा राष्ट्रभक्त हूँ,
तो गोडसे नें गांधी को गोली से उडा दिया ,
यह है इनका राष्ट्रभक्ति पर फैसला करने का तरीका,
और यह है इनकी समझ,
इस समझ और इस तरीके से यह सबकी राष्ट्रभक्ति पर फैसला करने वाले न्यायाधीश बने घूमते हैं,
यही मूर्खता हिंदुत्व की राजनीति का आधार है,
जिस राष्ट्र की यह भक्ति करते हैं इनके उस राष्ट्र में देश की जनता नहीं है,
इनके सपने के राष्ट्र में आदिवासी नहीं हैं, दलित नहीं हैं, मुसलमान नहीं हैं, इसाई नहीं हैं, कम्युनिस्ट नहीं हैं, कांग्रेस नहीं है, केजरीवाल नहीं है,
इनका राष्ट्र कल्पना का राष्ट्र है ,
सचमुच का देश नहीं ,
इनसे कभी पूछिए कि अच्छा तुम मुसलमानों को इतनी गाली बकते हो,
तो अगर तुम्हारे मन की कर दी जाय तो तुम मुसलमानों के साथ क्या करोगे ?
क्योंकि तुम भारत से मुसलमानों के सफाए के नाम पर हज़ार दो हज़ार को ही मार पाते हो ,
भारत में तो करीब बीस करोड़ मुसलमान हैं,
क्या करोगे इनके साथ ?
क्या सबको मारना चाहते हो ?
या सबको हिन्दू बनाना चाहते हो ?
या सबको भारत से बाहर भगाना चाहते हो ?
क्यों नफरत करते हो उनसे ?
करना क्या चाहते हो ?
तो यह संघी बगलें झाँकने लगते हैं,
मेरे एक दोस्त नें एक बार एक संघी नेता से पूछा,
कि आप अखंड भारत फिर से बनाने की बात संघ की शाखा में करते हैं ,
और कहते हो कि अफगानिस्तान, बंगलादेश, पकिस्तान सबको मिला कर अखंड भारत बनाना है ,
लेकिन यह सभी देश तो मुस्लिम बहुल हैं ,
तो अगर इन्हें भारत में मिलाया गया तो भारत में मुसलमान बहुमत में हो जायेंगे
और अगर हम इन्हें हिन्दू बनाना चाहते हैं तो इतनी बड़ी आबादी को हम थोड़े से हिन्दू कैसे बदल पायेंगे ?
इस पर वह संघी नेता आंय बायं करने लगे और कोई जवाब नहीं दे पाए,
आरएसएस की कोई समझ नहीं है ,
ये मूर्खों और कट्टरपंथियों का जमावड़ा है,
इनका काम भाजपा के लिए वोट बटोरने और उसके लिए हिन्दू युवकों के मन में ज़हर भरते रहने का है,
राष्ट्रीय स्वयं सेवक सेवक संघ नें जितना नुक्सान भारत का किया है उतना कोई विदेशी शत्रु भी नहीं कर पाया ,
भारत के युवा जब तक खुले दिमाग और खुली समझ वाले नहीं बनेंगे ,
जब तक युवा देश की जाति , सम्प्रदाय और आर्थिक लूट की समस्या को हल नहीं करेंगे ,
भारत इसी दलदल में लिथडता रहेगा ,
यह साम्प्रदायिक जोंकें भारत का खून ऐसे ही पीती रहेंगी,

विश्ववादिनी

छत्तीसगढ़ में एक टीवी चैनल पर एक चर्चा चल रही थी,
विषय था आदिवासी महिलाओं को बड़े शहरों में ले जाकर शोषण करने का,

भाजपा की प्रवक्ता विश्ववादिनी ने कहा कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों में प्रथा है कि ये लोग अपनी बेटियों से देह व्यपार करवाते हैं ,
और उनकी आय पर गुज़ारा करते हैं,
मैं यह सुन कर दंग रह गया,
मैंने आदिवासियों के बीच तीस साल गुज़ारे हैं,
मै आदिवासियों की सामाजिक व्यवस्था और उच्च नैतिक मूल्यों का कायल हूँ,
आदिवासियों में ऐसी कोई प्रथा नहीं है ,
छत्तीसगढ़ में भाजपा शासन में है,
अगर शासक दल की अपने आदिवासियों के बारे में यही समझ है,
तो यह शासन आदिवासियों के साथ कैसा व्यवहार करेगा ?
और किसी समस्या का क्या समाधान करेगा ?
छत्तीसगढ़ में अनेकों संगठन सड़कों पर इस बयान के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं
फिर भी भाजपा ने अभी तक इस बयान के लिए कोई माफी नहीं माँगी है, ,
मुझे लगता है भाजपा ना सिर्फ देश की एकता के लिए खतरा है,
बल्कि भाजपा भारत की संस्कृति और सभ्यता के लिए भी एक खतरा है,
क्योंकि इन लोगों को इन सब की कोई समझ ही नहीं है ,

प्रधानमंत्री की फोटो


अम्बानी की जिओ कंपनी ने प्रधानमंत्री की फोटो को विज्ञापन में इस्तेमाल किया
देश की जनता नें इस पर आपत्ति करी,
क्योंकि प्रधानमंत्री एक व्यक्ति नहीं है वह एक पद है,
प्रधानमंत्री का इस्तेमाल कर के कोई व्यपारी अपना व्यापार नहीं चमका सकता,
हाँ नरेंद्र मोदी जब प्रधान मंत्री ना रहें तब वो ज़रूर जिओ के सिम के लिए विज्ञापन में भाग लेने के लिए स्वतंत्र हैं,
तब कोई आपत्ति नहीं कर सकता,
इस मामले पर बहुत ही आपराधिक तरह से प्रधानमंत्री नें चुप्पी साधी,
महीनों तक इस पर बोले ही नहीं,
सरकार नें भी महीनों तक कोई कार्यवाही नहीं करी,
इससे जनता में यह समझ बनी कि इस विज्ञापन में प्रधानमंत्री के चित्र का इस्तेमाल जिओ कम्पनी नें असल में प्रधान मंत्री की सहमती से ही किया था,
इसलिए अब सरकार प्रधानमंत्री को बचाने के लिए चुप होकर बैठ गयी है,
अब जाकर कई महीने बाद सरकार नें अम्बानी की कम्पनी जिओ पर पांच सौ रूपये का जुर्माना लगाया है,
यह जुर्माना बहुत बड़ा सबूत है,
सबूत इस बात का है कि सरकार नें मान लिया कि जिओ कम्पनी नें अपराध किया था,
और जिओ कम्पनी को इस अपराध की सजा भी मिलनी चाहिए,
ये दो कदम सही दिशा में बढाने के बाद सरकार नें जो सजा के रूप में जुर्माने की रकम घोषित करी थी ,
उस रकम से सरकार नें फिर से अपना फजीता करवा लिया है,
समझ में नहीं आता कि सरकार में वो कौन लोग हैं जो सरकार से दुश्मनी निकाल रहे हैं ?
क्योंकि अगर सरकार अम्बानी से पांच सौ रूपये जुर्माना वसूलेगी तो जनता सरकार की हंसी नहीं उड़ाएगी क्या ?
जनता सरकार की नियत पर शक नहीं करेगी क्या ?
इससे इस बात को और बल नहीं मिलेगा क्या कि सरकार जान बूझ कर अम्बानी कम्पनी को फायदा पहुँचाने का काम कर रही है ?
इतनी मूर्खता करने वाली सरकार मैंने पहले कभी नहीं देखी थी ,

युवा मूर्ख और क्रूर हो जाएगा ?

क्या भारत का युवा मूर्ख और क्रूर हो जाएगा ?
युवा पीढी को हर पिछली पीढी के मुकाबले अधिक उदार, अधिक समझदार और अधिक प्रगतिशील बनना पड़ता है ,
तभी दुनिया आगे को बढ़ती है ,
अभी तक पूरे इतिहास में ऐसा ही होता आया है,
लेकिन अभी दुनिया में कुछ ऐसे संकेत दिखाई दे रहे हैं ,
कि एक बहुत छोटी संख्या को छोड़ दें तो बहुसंख्य युवा क्रूर और स्वार्थी नेताओं को समर्थन दे रहे हैं,
अमेरिका में ट्रम्प और भारत में मोदी का जीतना उसके ताज़ा उदाहरण हैं,
इसके खतरे बहुत गहरे और लम्बे समय तक समाज पर असर डालेंगे,
अगर युवा नफरत करने वाले और आर्थिक लूट को समर्थन देने वाले बन जायेंगे ,
तो उस समाज में समझदारी, उदारता और विचारों की तरक्की रुक जायेगी,
कला, साहित्य संस्कृति, कविता, आदि उदार और आज़ाद दिमाग से पैदा होते हैं,
नफरत से भरे हुए युवा इन सब की रचना कर ही नहीं सकते,
वो समाज कैसा होगा जो संस्कृति से हीन होगा,
नफरत की एक और खासियत होती है,
इसे समझा ना जाय तो यह बढ़ती जाती है,
जो समाज नफरत से भरा होगा और संस्कृति से हीन होगा,
क्या वह शान्ति से रह पायेगा ?
क्या ऐसा विकृत समाज युद्ध नहीं करेगा ?
क्या आज के विज्ञान के युग में युद्ध प्रेमी समाज खुद ही समाप्त नहीं हो जाएगा ?
हम हिंसा और नफरत के ऐसे रास्ते पर चल पड़े हैं जिसका अंजाम खुद को नष्ट कर लेना ही है,
हमें यह भी समझ लेना चाहिए ज्यादातर नफरत और क्रूरता दुनिया के संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की नियत से पैदा करी गयी हैं,
जैसे मुसलमानों के खिलाफ युद्ध तेल पर कब्ज़े के लिए खड़ा किया गया,
आदिवासियों पर युद्ध खनिजों के लिए शुरू किया गया,
एक ऐसा समाज बनाया गया जो इस तरह की लूट पर मजे करे,
फिर लूट के समर्थन में पूरी राजनीति बनाई गयी,
ऐसा आप पूरी दुनिया में देख सकते हैं और भारत में भी,
इसलिए अब अगर इंसानी नस्ल को बचाना है ,
तो इंसान के द्वारा इंसान की लूट को खतम करना पड़ेगा,
इंसान के द्वारा इन्सान से नफरत को खतम करना पड़ेगा,
चाहे वह नफरत किसी के धर्म के आधार पर पैदा करी गयी हो,
चाहे वह किसी के देश के आधार पर पैदा करी गयी हो ,चाहे जाति, रंग या भाषा के आधार पर पैदा करी गयी हो,
नफरत की राजनीति इंसान के अस्तित्व के लिए खतरा है,
इसे अभी ही समझने की ज़रूरत है,