Thursday, February 14, 2013

अफजल की फांसी के बारे में ना लिखें



कल अफजल गुरु का पत्र पढ़ रहा था . अफजल ने लिखा है कि पुलिस उसे बार बार पकड़ लेती थी और उसे हर बार रिहा होने के लिये रिश्वत देनी पड़ती थी .पुलिस उसे और उस जैसे अन्य कश्मीरी नौजवानों को इसी तरह पकड़ लेती थी और उन्हें भी बुरी तरह सताती थी .एक बार अफज़ल को छोड़ने के के लिये पुलिस ने एक लाख रूपये की रिश्वत माँगी थी . अफज़ल ने अपना स्कूटर और अपनी बीबी के जेवर बेच कर पुलिस को रिश्वत दी थी .

अफजल ने लिखा है कि पुलिस वाले उनके गुप्तांगों में मिर्चें डालते थे और बिजली का करेंट लगाते थे. अफजल आगे लिखता है कि एक पुलिस अधिकारी देविंदर सिंह ने उससे एक छोटा सा काम करने के लिये कहा था और अफजल से दिल्ली में एक आदमी के लिये एक किराये के मकान का इंतजाम करने के लिये कहा था . पुलिस का कहा हुआ काम कर देने के बाद जब अफजल अपने घर वापिस जा रहा था तो पुलिस ने उसे बस अड्डे से पकड़ लिया और उसे संसद पर हमले का आरोपी बना कर अदालत में पेश कर दिया और उसे फांसी की सज़ा दिलवा कर मरवा दिया .
पता नहीं क्यों मुझे यह पत्र बहुत जाना पहचाना सा लग रहा है ? इस पत्र को पढते समय मुझे देजावु जैसा अनुभव हो रहा है जिसमे आपको लगता है कि ऐसा तो आपने पहले भी कहीं देखा था .
मेरे आदिवासी साथियों लिंगा कोडोपी और कोपा कुंजाम  को भी पुलिस ने ऐसे ही पकड़ा था . कोपा कुंजाम को थाने में उल्टा लटका कर रात भार पीटा जाता है और उसके नीचे से मिर्च का धुंआ किया जाता है .लिंगा कोडोपी को भी जेल में चालीस दिन तक थाने के शौचालय में बंद कर के रखा जाता है और उसे करीब करीब भूखा रखा जाता है .

कोपा कुंजाम को रात भर पिटाई के दौरान पुलिस उससे कहती है कि तुम गावों को दोबारा बसाने का काम बंद कर दो तो हम तुम्हें छोड़ देंगे . कोपा से किसी अपहरण या हत्या के बारे में पुलिस कुछ भी नहीं कहती .लेकिन दो दिन बाद कोपा को एक अपहरण और हत्या के मामले में अदालत में पेश कर देती है . बाद में अदालत में जिसके अपहरण का कोपा पर अपराध बनाया गया था वह खुद अदालत में आकर कहता है कि कोपा तो मुझे अपहरण के समय बचाने के लिये नक्सलियों से झगड रहा था . लेकिन तब तक कोपा जेल में दो साल गुजार चुका है और कोपा कुंजाम का आदिवासियों को गावों में बसाने का काम बंद हो जाता है .

अफज़ल के मामले की तरह ही एक अधिकारी मानेकर सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी के पास आता है और उनसे कहता है कि आप लोग हमारा एक छोटा सा काम कर दो कि एस्सार कम्पनी के एक आदमी को नक्सली बन कर फोन कर दो और उनसे पन्द्रह लाख रूपये लेकर आने के लिये कहो तो हम तुम पर लगाये गये पुराने सभी केस बंद कर देंगे . लिंगा कोडोपी और सोनी सोरी ऐसा करने से मना कर देते हैं. अगले दिन पुलिस लिंगा कोडोपी को उसके घर से उठा कर ले जाती है . सोनी सोरी कानूनी मदद के लिये दिल्ली आती है . दिल्ली में सोनी सोरी को पुलिस बस स्टैंड से से पकड़ लेती है . सोनी को थाने में करेंट लगाया जाता है और पुलिस उनके गुप्तांगों में पत्थर भर देती है .
कोपा कुंजाम की तरह ही बाद में अदालत में गवाह सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी को उनके खिलाफ लगाये गये मामलों में निर्दोष बताते हैं . फिर भी कानूनी प्रक्रिया उन्हें जेल में ही रखे हुए है . जबकि उनके साथ क्रूरता करने वाले पुलिस अधिकारी को राष्ट्रपति वीरता का पुरस्कार देता है .
लेकिन गवाहों के कहने से क्या होता है ? गवाह तो अफजल के खिलाफ भी कोई नहीं था .लेकिन जब पुलिस सरकार और अदालत किसी को मार डालने और किसी एक कौम को सबक सिखाने का ही फ़ैसला कर ले तो फिर गवाही ,सबूत और सच्चाई का क्या अर्थ बचता है ?
जब हम किसी ज़मीन के टुकड़े को राष्ट्र घोषित करते हैं तो उस ज़मीन के टुकड़े पर रहने वाले सभी लोगों को न्याय और बराबरी देने का वादा करते हैं .

लेकिन भारतीय राष्ट्र अपने देश के करोड़ों आदिवासी ,दलित ,अल्पसंख्यक लोगों को उनके जन्म के स्थान, समुदाय और हैसियत के आधार पर बराबरी और न्याय से वंचित कर रहा है . सबसे भयानक बात यह है कि अपने ही कमज़ोर लोगों के साथ अन्याय करने का काम वही संस्थाएं कर रही हैं जिन पर सभी नागरिकों के लिये न्याय और बराबरी सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी थी .
मनोरमा , अपर्णा मरांडी ,आरती मांझी, सोनी सोरी, इसलिये सरकार की क्रूरता का शिकार बनी क्योंकि उनका सम्बन्ध एक खास समुदाय और स्थान से है .

अगर किसी खास समुदाय के करोड़ों लोगों को ऐसा महसूस होगा कि उन्हें इस देश में बराबरी और न्याय नहीं मिल रहा है तो वो खुद पर अन्याय करने वाले समूह के साथ क्यों रहना चाहेंगे ?
हमारा अन्याय इस देश के अस्तित्व को खतरे में डाल सकता है .

बहुत से मित्र हम से कह रहे हैं कि हम अफजल की फांसी के बारे में ना लिखें और एक देशभक्त की तरह हमें अपनी सरकार का समर्थन करना चाहिये . कुछ मित्र हम से कह रहे हैं कि अफजल की फांसी पर सवाल उठाना देशद्रोह है . कुछ साथी तो हमें पकिस्तान समर्थक भी कह रहे हैं .
लेकिन आपको समझना चाहिये कि आपकी ये अंधराष्ट्रभक्ति किस तरह अपने ही करोड़ों देशवासियों के साथ भयंकर अन्याय का आधार बन रही है और आपके इस व्यवहार से सरकार को अन्याय जारी रखने में आपका समर्थन मिल रहा है .

अतीत में भी दुनिया के अनेकों देशों में इसी तरह बहुसंख्य लोगों ने अपने कमज़ोर समुदायों को अन्याय और भयानक कष्ट सहने के लिये विवश किया और उसका परिणाम गृह युद्धों के रूप में सामने आया . इस तरह के गृह युद्धों के कारण कई राष्ट्र टुकड़े टुकड़े हो गये नए राष्ट्र अस्तित्व में आ गये .

इसलिये राष्ट्र को एक रखने के लिये सबको न्याय और बराबरी देना ही एक मात्र रास्ता है . आप अन्याय करते हुए मात्र सेना और पुलिस के दम पर राष्ट्र को कभी भी सुरक्षित नहीं रख सकते .

9 comments:

  1. विचारणीय आलेख है सर!


    सादर

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  2. Chalo maan liya ki is desh men samajhdari ka theka sirf aap logon ne hi liya hai. Is bare men samaj ke tathakathit secular logon ki raay kya hai? kah do ki ye bhi jhooth hai?
    http://www.youtube.com/watch?v=wZY_oRK5VN8

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  3. बसन्त पंचमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ!


    दिनांक 16 /02/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. kah do ki ye bhi jhooth hai.
    http://www.bhaskar.com/article/c-181-781282-NOR.html?HT1=
    ek naksali hi sachche hain.

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  5. doodh mangoge ,kheer denge .kashmeer mangoge cheer denge

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  6. श्रीमान अज्ञात महोदय ! अगर इतने ही शूरवीर हो तो सामने आओ !कश्मीर तुम्हारे बाप का नहीं ,कश्मीरियों का हे और अफजल गुरु ने तुम्हारे बाप को नहीं मार डाला था ...!

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  7. मैं अफजल गुरु की फाँसी का समर्थन या विरोध नहीं कर रहा हूँ पर इस लेख की कुछ बेसिक बातें मुझे समझ नहीं आ रही हैं। अफजल गुरु का वो कौन सा पत्र है जो अभी तक मीडिया में नहीं आया और आपने बडी आसानी से उसे पढ लिया, उस पत्र की एक प्रति फेसबुक पर डाल दीजिए, दूसरी बात आपने अफजल गुरु और लिंगा कोपोडी की तुलना की है आदिवासियों पर पुलिसिया जुल्म की दास्तान हम आए दिन पढते रहते हैं और वास्तव में यह एक कडवी सच्चाई है पर क्या आपको लगता है कि एक विश्वविख्यात विश्वविद्यालय के प्रोफेसर की स्थिति इतनी खराब थी कि पुलिस ने उसे बिना किसी सबूत के पकड लिया और विश्वविद्यालय के प्रशासन से आसानी से ये सब होने दिया, क्या एक प्रोफेसर को बिना जुर्म के पकडना इतना आसान है??? तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात क्या भारत का संविधान इतना लचर है कि किसी बेगुनाह को बिना किसी सबूत के फाँसी की सजा मिल जाए.... और वो भी उस सरकार के राज्य में जो इन मामलों को इतनी संवेदनशीलता से ले रही है कि देश की दो प्रमुख जाँच एजेंसियाँ के दूसरे के सामने खड़ी हो गई हैं.... किस मुगालते में हैं आप??? उत्तर अवश्य दीजिएगा आप भी और सुंदरम भी .....

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