Wednesday, March 28, 2012

क्योंकि ये लड़ाई सच और झूठ का है- सोनी सोरी का सर्वोच्च न्यायालय के नाम खत This fight is between truth and falsehoods- Soni Sori





सुप्रीमकोर्ट  न्यायालय जज साहब, वकील सर के नाम पर खत
माननीय जज साहब, छत्तीसगढ़ सरकार मेरे साथ आज की स्थिति में भी बहुत गलत कर रही है | ये सब सहते तकलीफ, अन्यायों के बारे में खत के माध्यम से लिखकर बार-बार आपको परेशान करना, दुःख पहुचाना या इस केस की फ़ैसला के लिये जोर देने की इरादा मेरे मन में बिल्कुल नहीं है | क्या करूँ मैं मजबूर हूँ | पर मेरी हालत को कोई समझना नहीं चाहता | मेरी पूरी कोशिश रहती है कि जो कुछ समस्या है, जेल से हों या न्यायालय से समाधान हों जाये पर होता नहीं है बल्कि और बढा दिया जाता है | जिससे मजबूर होकर आप तक जानकारी शिकायत देने करने के लिये विवश हों जाति हूँ | आप पर मुझे पूरा विश्वास है | जब भी इस केस की सुनवाई होगी सच्चाई को देखते हुए, पक्ष-विपक्ष को सुनते हुए देगे | क्योंकि ये लड़ाई सच और झूठ का है | इस सच-झूठ को पुलिस प्रशासन जानने के बावजूद भी मुझपर अत्याचार किया कर रहा है | एस्सार नोट कांड ने मेरी जिंदगी को बर्बाद कर दिया | आज भी मेरी जीवन  मौत की कगार में है | अब मुझे ये देखना है मैंने सुना भी पढ़ा भी सच परेशान हों सकता है पर पराजित नहीं हों सकता | सच की राह में चलते-चलते बहुत से कठिनाइयाँ, परेशानी तकलीफों का सामना किया कर रही हूँ | जहां तक अपने आपको खो दिया ये शरीर भी अत्याचार जुल्म को सहते-सहते इस स्थिति में पहुंच चुका है कब मेरा साथ छोड़ दे, कोई भरोसा नहीं | इस वक्त बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है | तीन महीने हों चुके दवाई नहीं दिया जा रहा है | इलाज को अधूरा करके छोड़ दिया गया | शरीर की तकलीफ बहुत अधिक बढ़ चुकी है | चलने में परेशानी, अचानक शरीर सूज जाता है | चलते चलते पैर शून्य हों जाते हैं | मैं भी तो इंसान ही हूँ ऐसा अन्याय क्यों? इतनी तडप कष्ट सजा की जीवन क्यों दिया जा रहा है| जज साहब मैं आपसे न्यायालय से जानना चाहती हूँ कि मेरा गुनाह क्या है? एक तो मानसिक रूप प्रताड़ित किये, बेरहमी के साथ अत्याचार करके इन सलाखों में डाल दिया गया | यदि मुझे जेल में भेजना ही था तो ऐसा चोट जख्म, जुल्म देकर क्यों भेजा गया | जेल में डाल भी दिये तो आज पुलिस प्रशासन के द्वारा दिया गया जख्मों का इलाज कराने स्वास्थ्य की हालात को सुधार करने में असमर्थ क्यों है | सुप्रीम कोर्ट न्यायालय की आदेश से कलकता में मेरी इलाज हुई, इलाज के दौरान डाक्टर सर ने सलाह दिया था कि ये दवाई को रेगुलर लेते रहना जब तक आपकी अंदरूनी दर्द कम न हों जाये | वो दवाई भी नहीं दिया जा रहा है | मैंने इस बत की शिकायत जगदलपुर जेल में किया, रायपुर आने के बाद रायपुर में जेलर मैडम से अनेक बार कहा | स्थानीय न्यायालय दंतेवाड़ा में भी कहा कि मुझे अंदरूनी तकलीफ बढ़ रही है | मुझे दवाई की उपलब्ध कराया जाये | इसके बावजूद भी आज तक दवाई नहीं मिल रही है | इस स्थिति से परेशान होकर मैंने जेल की डाक्टर मैडम से कहा कि मेरी इलाज करवाया जाये | डाक्टर मैडम कहने लगी तुम प्रशासनिक तौर से आई हों और नक्सली महिला लिखित में देकर मानसिक रूप से प्रताडित किया गया | फिर मैं कुछ दिन चुप रही | मेरी दर्द बढती ही जा रही है इस स्थिति में मैंने दिनांक २७.०२.२०१२ को पेशी में जाने से वकील से फिर कहा, ऐसी स्थिति रहा तो मेरा जिन्दा रहना मुश्किल है | तब वकीलों ने मेरी इलाज के लिये न्यायालय में आवेदन दिया जिससे स्वीकृति मिल गई और जेल में आदेश भी मेरी इलाज के नाम पर आया | दिनांक १.३.२०१२ को जेलर मैडम ने मुझे अस्पताल भेजे उस दिन मेरी इलाज पूरी तरह नहीं हों पाया | समय की अवधि खत्म होने के वजह से फिर हमें डाक्टर ने दिनांक ६.३.२०१२ को बुलाया ताकि उस दिन मेरी सोनोग्राफी करवाना था ५.३.२०१२ को मुझे अस्पताल नहीं ले गये | तब मैंने जेलर मैडम, जेल अधीक्षक को कहा कि सर मेरी  अंदरूनी दर्द, पीड़ा ज्यादा होने लगा है | आप हमे इलाज के लिये क्यों नहीं भेज रहे हों | डाक्टर सोनोग्राफी का सलाह दिया है, वो कराना जरुरी है | प्लीज आपलोग इसतरह लापरवाही मत कीजियेगा | मुझमे बहुत ही कमजोरी आ गई, इस वक्त मैं कुछ कर भी नहीं पाती हूँ | बहुत सा तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है | आप मुझे अस्पताल भेजकर सोनोग्राफी कर लाइयेगा ताकि ऐसा दवाई प्राप्त हों जिससे मुझे दर्द में राहत मिल सके| इतने सारे परेशानी बताने पर जेल अधीक्षक कहा कि मैं कुछ नहीं कर सकता, मेरे हाथ में कुछ नहीं है | तो अब हम कैसे करें किससे बताए तो कहा वो मैं नहीं जनता समझी | फिर मैंने कहा एक तो आप लोग ने मुझे ६.३.२०१२ की पेशी में भी उपस्थित नहीं कराये क्यों? यदि हम पेशी में जाते तो अपनी इस समस्या को न्यायालय में रखते, ये सबसे आप लोगों ने मुझे वंचित कर दिया | ये पेशी में उपस्थित होना अनिवार्य था | अब इसके जिम्मेदार कौन है? फिर वही जवाब ये सबसे मेरा कोई लेना देना नहीं है | ना ही मेरी जिम्मेदारी है समझी | तब मैंने कहा ठीक है सर मैं अब सरकार को खत लिखूंगी | जज साहब मेरे द्वारा लिखी बातों पर गौर कीजियेगा| इस स्थिति में मैं क्या करूँ| ये सब मैं आप पर छोडती हूँ | छत्तीसगढ़ सरकार की नियम कानून अत्याचार से हरसत हों चुकी हूँ | जज साहब मुझे हर पेशी में उपस्थित होना जरुरी है क्योंकि मेरा परिवार न्यायलय में  हर बार आ नहीं सकता, परिस्थितियों के वजह से और मुझपर जो आरोप लगे हैं| उन केसों की सच झूठ को मुझे जानना है | दवाई ना मिलने के वजह से और इलाज ना कराने के वजह से मेरी अंदरूनी तकलीफ बढ़ चुकी है | मेरे पिता को नक्सलियों ने पैर पर गोली मारे जिससे विकलांग हों चुके हैं | जब न्यायालय में मुझसे मिलने आते हैं तो मेरे पिता को लाचार किया जाता है | मेरे बच्चे को मानसिक रूप से परेशान किया जाता है | बच्चे ये सब से अनजान हैं | बच्चो को पुछ ताछ क्यों पुलिस की इस तरह की व्यवहार पूछ ताछ से मेरी बच्ची की मानसिकता पर डर पैदा हो रही है | ये डर मेरी बच्ची के जीवन के लिये ठीक नहीं है | आगामी में हमें कुछ हों जाये तो मेरे बच्चों का आश्रय अवश्य बना दीजियेगा जज साहब | मेरे सिवाय मेरे बच्चों का कोई भी नहीं इन बच्चों का पिता है भी तो जेल में है | मेरे पिता की सम्पति को तो नक्सलियों ने पूरी तरह बर्बाद कर दिया | जिससे ये परिवार भी लचारता की जीवन जी रहा है | रायपुर जेल हों या छत्तीसगढ़ के अन्य जेल हों, मुझे अच्छी हालात में रहने नहीं देंगे ना ही रखेंगे | ना ही मैं सुरक्षित महसूस कार सकती हूँ ना ही सुरक्षित हूँ | फिर भी मुझे रायपुर जेल से वापस जगदलपुर जेल में किया जाये | ताकि बच्चों से बीच-बीच में मिल सकूँ| जबतक जीवित हूँ एक ना एक दिन छत्तीसगढ़ सरकार मुझे मौत देगा ही | क्योंकि हम जैसे आदिवासियों को अत्याचार जुल्म प्रताडित करके मौत देना सरकार की सबसे बड़ी जीत कामयाबी है | इस कामयाबी से सरकार पीछे कैसे हट सकती है | जज साहब रायपुर जेल में बहुत ही परेशानी हों रही है | आपसे निवेदन है कि हमें वापस किया जाये | गलती पे क्षमा |

प्रार्थी
श्रीमती सोनी सोरी
७.३.२०१२  

Letter to the Supreme Court Judge (through  Advocate sir)
Honourable Judge Sahib, the Chhattisgarh government is committing many wrongs on me even today.  I tolerate everything, and I do not have any intention of troubling you repeatedly through my letters, or causing grief to you, or putting any undue pressure on the decision of any case. But what can I do – I am compelled to do this (write to you), since no one wants to understand my circumstances.  I try my utmost that whatever problem I encounter gets resolved through the jail authorities or in the (lower) courts. But it does not happen this way, and instead, the problems get compounded.  Due to this, I am left with no option but am compelled to give you the information/ complaint. I have full faith in you.  Whenever this court (Supreme Court) hears the case, it will seek the truth and decide only after hearing both sides. 
This fight is between truth and falsehoods. Even knowing all the truth and falsehoods, the police and administration is heaping atrocities on me.  The Essar note incident has ruined my life.  Even now, my life is on the verge of death.  Now I have to see for myself—I have heard and I have read that Truth can be beleagured but it cannot be defeated.  Walking on this path of Truth, I am facing many difficulties, trials and tribulations.  While I have lost myself, my body has also borne so many atrocities that there is no saying when it may also stop supporting me. 
At this time, I have to face many difficulties. Three months have passed and I am not being given any medicines.  My treatment was left incomplete.  The problem in my body has increased significantly.  I have problems walking.  Suddenly, my body swells up.  While walking, my feet suddenly go numb.  Even I am a human being, then why this injustice?  Why have I been condemned to this life of torment, agony and punishment?
Judge Sahib, I want to know from you, from the Court, what wrong have I committed? First, they tortured me mentally, committed unbearable atrocities on me, and put me behind these prison bars. If I had to be sent to prison in any case, then why send me after subjecting me to such injuries, wounds and atrocities? And even if they have put me in prison, why are they unable to give me treatment for the wounds inflicted by the police and administration, to get me back into a healthy condition? 
It was upon the order of the Supreme Court that I was taken to Kolkata for treatment.  During the treatment, the doctor advised me to be regular in taking my medicines till the internal pains do not get better. But I am not being given these medicines.  I have complained about this in the Jagdalpur jail.  After coming to the Raipur jail, I have told the Jailor Madam many times about this.  Even in the lower court in Dantewada, I said that my internal problems are increasing.  My medicines should be made available to me.  In spite of all this, I have not been given medicines till today.  Troubled by such circumstances, I even asked the Doctor Madam of the Jail that I need to be treated.  The Doctor Madam began to  say, “You have come here through the Administration” and put in writing that I am a Naxalite woman and thus I was put through mental harassment.  Then, I kept quiet for a few days.  My pains go on increasing. 
Under such circumstances, on 27-02-2012, when I went for the court hearing and saw my lawyer, I told him that in this condition, it will be difficult for me to stay alive.  Then the lawyers presented an application in the court for my treatment.  The application was approved and the jail received an order for my treatment. 
On 1-2-2012, Jailor madam sent me to the hospital.  But my treatment could not be completed that day.  Since the time (for seeing patients) was up, the doctor called us back on 6-3-2012 so that sonography could be conducted that day.  But I was not taken to the hospital on 5-3-2012. Then I told the Jailor Madam and the Jail Superintendent that, “Sir, my internal pains and problems are increasing.  Why are you not sending me to for treatment?  The Doctor has recommended sonography.  It is important to get it done.  Please, do not be so negligent in this matter. I have a lot of weakness. At this time, I am unable to do anything.  I have to face a lot of difficulties.  Please send me to the hospital and get my sonography done, so that I can get the right medicines which will provide me relief from my pains.” 
Even on explaining all this to him, the Jail Superintendent said, “I cannot do anything.  Nothing is in my hands.”   
I asked him then, “If all this is not in your hands, in your control, then what should I do? Please tell me. “
He said, “I don’t know. Understand?”
Then I said, “First, you did not even take me for the hearing on 6-3-2012 and produce me in the court there.  Had I gone for the hearing, I could have informed the court about my condition.  You have deprived me of this opportunity.  It was necessary for me to be present in this hearing.  Now, who is responsible for this?”
The same reply, “I have nothing to do with all this.  Nor is this my responsibility.  Understand?”
Then I said, “Alright, sir.  I will write a letter to the government.”
Honourable Judge sir, please give some thought to what I have written.  What should I do under these circumstances?  I leave all this to you.  I am weary of the rules, regulations and injustices of the Chhattisgarh government.
Judge sahib, it is necessary for me to be present for my hearings because my family cannot make it to each hearing due to their circumstances, and I need to know about the charges against me and the truth and falsehoods of the cases against me. 
(2) My internal problems have worsened because of non-availability of medicines and treatment.
(3) My father is now disabled because the Naxalites shot him in the leg.  When he comes to meet me in the court, he is made to feel helpless.  My children are being mentally harassed.  My children do not know anything.  Why are my children interrogated?  My little girl is now mentally traumatized and fearful due to this behavior of the police.  This fear is not good for my girl’s life.  Should something happen to me in the near future, please ensure that my children are taken care of.  These children have no one besides me – even the father of my children is in jail.   My father’s property has been completely destroyed by the Naxalites.  This is why even this family is living a life of destitution. 
Whether it is the Raipur Jail or some other jail in Chhattisgarh, I will not be allowed to live in a good condition, nor will they keep me in a good condition.  Neither can I feel protected, nor am I safe.  Still, I should be sent back from the Raipur jail to the Jagdalpur jail so that I can meet my children from time to time, till I am alive.  One of these days, the Chhattisgarh government will surely kill me. Because subjecting adivasis like me to atrocities, cruelties and torture, and then awarding us with death is the biggest victory and success of this government. 
Judge sahib, I am facing a lot of difficulties in the Raipur Jail.  I pray to you to be taken back.  Please forgive me for my mistakes.
Applicant,
Shirmati Soni Sori (Sodhi)
7-3-2012


2 comments:

  1. one-after-one letter sent by Soni Sori to S.C./H.C. with in this hope that judges would take suo motto action...why judges do not consider her letter as PIL...Court should have to deliver justice in the geneder and humanity perspective...Jail to somebody is not solution of people's dissatisfaction about govt and development...Why r Judges doing delay in this case...this is a character of our judiciary that the justice must no be correction in government's policy or approach towards tribal people.

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